देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 691 of 889
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| ६८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्माणी वरटारूढा साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ १९<br><br>आगता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीति परिश्रुता।<br>वैष्णवी गरुडारूढा शङ्खचक्रगदाधरा॥ २०<br><br>पद्महस्ता समायाता पीताम्बरविभूषिता।<br>शाङ्करी तु वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी॥ २१<br><br>अर्धचन्द्रधरा देवी तथाहिवलया शिवा। | ब्रह्माजीकी शक्ति, जो ब्रह्माणी नामसे प्रख्यात हैं, हाथमें अक्षसूत्र तथा कमण्डलु धारण करके हंसपर आरूढ़ हो वहाँ आयीं। भगवान् विष्णुकी शक्ति वैष्णवी गरुडपर सवार होकर रणभूमिमें आयीं। वे पीताम्बरसे विभूषित थीं तथा उन्होंने हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण कर रखा था। शंकरकी शक्ति भगवती शिवा बैलपर सवार होकर हाथमें उत्तम त्रिशूल लिये मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये तथा सर्पोंके कंगन पहने वहाँ उपस्थित हुईं॥ १९-२१३॥ |
| कौमारी शिखिसंरूढा शक्तिहस्ता वरानना॥ २२<br><br>युद्धकामा समायाता कार्तिकेयस्वरूपिणी।<br>इन्द्राणी सुष्ठुवदना सुश्वेतगजवाहना॥ २३<br><br>वज्रहस्तातिरोषाढ्या संग्रामाभिमुखी ययौ।<br>वाराही शूकराकारा प्रौढप्रेतासना मता॥ २४<br><br>नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।<br>याम्या च महिषारूढा दण्डहस्ता भयप्रदा॥ २५<br><br>समायाताथ संग्रामे यमरूपा शुचिस्मिता।<br>तथैव वारुणी शक्तिः कौबेरी च मदोत्कटा॥ २६<br><br>एवंविधास्तथाकारा ययुः स्वस्वबलैर्वृताः।<br>आगतास्ताः समालोक्य देवी मुदमवाप च॥ २७<br><br>स्वस्था मुमुदिरे देवा दैत्याश्च भयमाययुः। | भगवान् कार्तिकेयके समान ही रूप धारण करके सुन्दर मुखवाली भगवती कौमारी युद्धकी इच्छासे हाथमें शक्ति धारण करके मयूरपर आरूढ़ होकर आयीं। सुन्दर मुखवाली इन्द्राणी अतिशय उज्ज्वल हाथीपर सवार होकर हाथमें वज्र लिये उग्र क्रोधसे आविष्ट हो समरभूमिमें पहुँचीं। इसी प्रकार सूकरका रूप धारण करके एक विशाल प्रेतपर सवार होकर भगवती वाराही, नृसिंहके समान रूप धारण करके भगवती नारसिंही और यमराजके ही समान रूपवाली भयदायिनी शक्ति भगवती याम्या हाथमें दण्ड धारण किये तथा महिषपर आरूढ़ होकर मधुर-मधुर मुसकराती हुई संग्राममें आयीं। उसी प्रकार वरुणकी शक्ति वारुणी तथा कुबेरकी मदोन्मत्त शक्ति कौबेरी भी समरभूमिमें पहुँच गयीं। इसी तरह अन्य देवताओंकी शक्तियाँ भी उन्हीं देवोंका रूप धारणकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ रणभूमिमें उपस्थित हुईं। उन शक्तियोंको वहाँ उपस्थित देखकर भगवती अम्बिका बहुत हर्षित हुईं। इससे देवता निश्चिन्त तथा प्रसन्न हो गये और दैत्य भयभीत हो उठे॥ २२-२७३॥ |
| ताभिः परिवृतस्तत्र शङ्करो लोकशङ्करः॥ २८<br><br>समागम्य च संग्रामे चण्डिकामित्युवाच ह।<br>हन्यन्तामसुराः शीघ्रं देवानां कार्यसिद्धये॥ २९<br><br>निशुम्भं चैव शुम्भं च ये चान्ये दानवाः स्थिताः।<br>हत्वा दैत्यबलं सर्वं कृत्वा च निर्भयं जगत्॥ ३० | लोककल्याणकारी शिवजी भी उन शक्तियोंके साथ वहाँ संग्राममें भगवती चण्डिकाके पास आकर उनसे कहने लगे—देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये आप शुम्भ-निशुम्भ तथा अन्य जो भी दानव उपस्थित हैं, उन सबका वध कर दीजिये। साथ ही सारी असुर-सेनाका संहार करके और इस प्रकार संसारको भयमुक्त करके ये समस्त शक्तियाँ अपने-अपने |