देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 688 of 889
Read in contextPage 688
| अ० २७ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६७१ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| श्रुत्वा शङ्खस्वनं चोग्रं रक्तबीजोऽतिवेगवान् ।<br>गत्वा समीपे चामुण्डां बभाषे वचनं मृदु ॥ ५० | उस भीषण शंखध्वनिको सुनकर वह रक्तबीज बड़े वेगसे देवी चामुण्डाके पास पहुँचकर मधुर वाणीमें उनसे कहने लगा ॥ ५० ॥ |
| रक्तबीज उवाच<br>बाले किं मां भीषयसि मत्वा त्वं कातरं किल ।<br>शङ्खनादेन तन्वङ्गि वेत्सि किं धूम्रलोचनम् ॥ ५१ | रक्तबीज बोला— हे बाले! क्या तुम कायर समझकर अपने शंखनादसे मुझको डरा रही हो ? हे कोमलांगि! क्या तुमने मुझे धूम्रलोचन समझ रखा है ? ॥ ५१ ॥ |
| रक्तबीजोऽस्मि नाम्नाहं त्वत्सकाशमिहागतः ।<br>युद्धेच्छा चेत्पिकालापे सज्जा भव भयं न मे ॥ ५२ | मेरा नाम रक्तबीज है। मैं यहाँ तुम्हारे ही पास आया हूँ। हे पिकभाषिणि! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो तैयार हो जाओ; मुझे तुमसे भय नहीं है ॥ ५२ ॥ |
| पश्याद्य मे बलं कान्ते दृष्टा ये कातरास्त्वया ।<br>नाहं पङ्क्तिगतस्तेषां कुरु युद्धं यथेच्छसि ॥ ५३ | हे कान्ते ! अब तुम मेरा पराक्रम देखो। अभीतक तुमने जिन-जिन कायर दैत्योंको देखा है, उनकी श्रेणीका मैं नहीं हूँ। तुम जिस तरहसे चाहो, वैसे लड़ लो ॥ ५३ ॥ |
| वृद्धाश्च सेविताः पूर्वं नीतिशास्त्रं श्रुतं त्वया ।<br>पठितं चार्थविज्ञानं विद्वद्गोष्ठी कृताथ वा ॥ ५४ | हे सुन्दरि! यदि तुमने वृद्धजनोंकी सेवा की हो, नीतिशास्त्रका अध्ययन किया हो, अर्थशास्त्र पढ़ा हो, विद्वानोंकी गोष्ठीमें भाग लिया हो और यदि तुम्हें साहित्य तथा तन्त्रविज्ञानका ज्ञान हो, तो मेरी हितकर, यथार्थ तथा प्रामाणिक बात सुन लो ॥ ५४-५५ ॥ |
| साहित्यतन्त्रविज्ञानं चेदस्ति तव सुन्दरि ।<br>शृणु मे वचनं पथ्यं तथ्यं प्रमितिबृंहितम् ॥ ५५ | |
| रसानाञ्च नवानां वै द्वावेव मुख्यतां गतौ ।<br>शृङ्गारकः शान्तरसो विद्वज्जनसभासु च ॥ ५६ | विद्वानोंकी सभाओंमें नौ रसोंके अन्तर्गत शृंगाररस तथा शान्तरस—ये दो रस ही मुख्य माने गये हैं। उन दोनोंमें भी शृंगाररस रसोंके राजाके रूपमें प्रतिष्ठित है। [इसीके प्रभावसे] विष्णु लक्ष्मीके साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, इन्द्र शचीके साथ और भगवान् शिव पार्वतीके साथ निवास करते हैं; उसी प्रकार वृक्ष लताके साथ, मृग मृगीके साथ और कपोत कपोतीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ५६—५८ ॥ |
| तयोः शृङ्गार एवादौ नृपभावे प्रतिष्ठितः ।<br>विष्णुर्लक्ष्म्या सहास्ते वै सावित्र्या चतुराननः ॥ ५७ | |
| शच्येन्द्रः शैलसुतया शङ्करः सह शेरते ।<br>वल्ल्या वृक्षो मृगो मृग्या कपोत्या च कपोतकः ॥ ५८ | |
| एवं सर्वे प्राणभृतः संयोगरसिका भृशम् ।<br>अप्राप्तभोगविभवा ये चान्ये कातरा नराः ॥ ५९ | इस प्रकार जगत्के समस्त जीवधारी संयोगजनित सुखका अत्यधिक उपभोग करते हैं। जो लोग भोग तथा वैभवका सुख नहीं प्राप्त कर सके हैं और अन्य जो कातर मनुष्य हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं और दैवसे वंचित होकर यति हो जाते हैं। संसारके रसका ज्ञान न रखनेवाले वे लोग मीठी-मीठी बात बोलनेमें निपुण धूर्तों तथा वंचकोंद्वारा ठग लिये जाते हैं और सदा शान्तरसमें निमग्न रहते हैं; किंतु काम, लोभ, भयंकर क्रोध और बुद्धिनाशक मोहके उत्पन्न होते ही |
| भवन्ति यतयस्ते वै मूढा दैवेन वञ्चिताः ।<br>असंसाररसज्ञास्ते वञ्चिता वञ्चनापरैः ॥ ६० | |
| मधुरालापनिपुणै रताः शान्तरसे हि ते ।<br>क्व ज्ञानं क्व च वैराग्यं वर्तमाने मनोभवे ॥ ६१ |