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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 685 of 889

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Page 685
६७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| देवदैत्यमनुष्येभ्यो न भवेन्मरणं मम।<br>सर्पकिन्नरयक्षेभ्यः पुंल्लिङ्गवाचकादपि ॥ १७ | प्रार्थना की थी—‘देवता, दैत्य, मनुष्य, सर्प, किन्नर, यक्ष और पुरुषवाचक जो भी प्राणी हैं—इनमें किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो’ ॥ १५–१७ ॥ |
| तस्मात्त्वां हन्तुकामैषा प्राप्ता योषिद्वरा प्रभो।<br>युद्धं मा कुरु राजेन्द्र विचार्यैवं धियाधुना ॥ १८ | हे प्रभो! इसी कारणसे यह श्रेष्ठ स्त्री आपका वध करनेकी इच्छासे आयी हुई है। अतएव हे राजेन्द्र! बुद्धिसे ऐसा विचार करके अब आप युद्ध मत कीजिये ॥ १८ ॥ |
| देवी ह्येषा महामाया प्रकृतिः परमा मता।<br>कल्पान्तकाले राजेन्द्र सर्वसंहारकारिणी ॥ १९ | इन देवी अम्बिकाको ही महामाया और परमा प्रकृति कहा गया है। हे राजेन्द्र! कल्पके अन्तमें ये भगवती ही सम्पूर्ण सृष्टिका संहार करती हैं ॥ १९ ॥ |
| उत्पादयित्री लोकानां देवानामेश्वरी शुभा।<br>त्रिगुणा तामसी देवी सर्वशक्तिसमन्विता ॥ २०<br><br>अजय्या चाक्षया नित्या सर्वज्ञा च सदोदिता।<br>वेदमाता च गायत्री सन्ध्या सर्वसुरालया ॥ २१<br><br>निर्गुणा सगुणा सिद्धा सर्वसिद्धिप्रदाव्यया।<br>आनन्दानन्दा गौरी देवानामभयप्रदा ॥ २२ | सबपर शासन करनेवाली ये कल्याणमयी देवी सम्पूर्ण लोकों तथा देवताओंको भी उत्पन्न करनेवाली हैं। ये देवी तीनों गुणोंसे युक्त हैं, फिर भी ये विशेषरूपसे तमोगुणसे युक्त और सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। ये अजेय, विनाशरहित, नित्य, सर्वज्ञ तथा सदा विराजमान रहती हैं। वेदमाता गायत्री और सन्ध्याके रूपमें प्रतिष्ठित ये देवी सम्पूर्ण देवताओंको आश्रय प्रदान करती हैं। ये देवी निर्गुण तथा सगुण-रूपवाली, स्वयं सिद्धस्वरूपिणी, सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली, अविनाशिनी, आनन्दस्वरूपा, सबको आनन्द देनेवाली, गौरी नामसे विख्यात तथा देवताओंको अभय प्रदान करनेवाली हैं ॥ २०–२२ ॥ |
| एवं ज्ञात्वा महाराज वैरभावं त्यजानया।<br>शरणं व्रज राजेन्द्र देवी त्वां पालयिष्यति ॥ २३<br><br>आज्ञाकरो भवैतस्याः सञ्जीवय निजं कुलम्।<br>हतशेषाश्च ये दैत्यास्ते भवन्तु चिरायुषः ॥ २४ | हे महाराज! ऐसा जानकर आप इनके साथ वैरभावका परित्याग कर दीजिये। हे राजेन्द्र! आप इनकी शरणमें चले जाइये; ये भगवती आपकी रक्षा करेंगी। आप इनके सेवक बन जाइये [और इस प्रकार] अपने कुलका जीवन बचा लीजिये; मरनेसे बचे हुए जो दैत्य हैं, वे भी दीर्घजीवी हो जायँ ॥ २३–२४ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भः सुरबलार्दनः।<br>उवाच वचनं तथ्यं वीरवर्यगुणान्वितम् ॥ २५ | व्यासजी बोले—उनका यह वचन सुनकर देवसेनाका मर्दन करनेवाले शुम्भने महान् वीरोंके पराक्रम-गुणसे सम्पन्न यथार्थ वचन कहना आरम्भ किया ॥ २५ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>मौनं कुर्वन्तु भो मन्दा यूयं भग्ना रणाजिरात्।<br>शीघ्रं गच्छत पातालं जीविताशा बलीयसी ॥ २६ | शुम्भ बोला—अरे मूर्खो! चुप रहो; तुमलोग युद्धभूमिसे भाग आये हो। तुम्हें यदि जीवित रहनेकी प्रबल अभिलाषा है तो तुम सब अभी पाताललोक चले जाओ ॥ २६ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 D