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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 672 of 889

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Page 672
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६३

| न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे।<br>अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम्॥ ६०<br><br>बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु॥ ६१ | तुम शस्त्रयुद्धके योग्य नहीं हो। जैसे कामिनीके पदप्रहारसे अशोक, मुख मदिराके सेचनसे मौलसिरी और कुरबक प्रफुल्लित हो उठता है, उसी प्रकार तुम भी महाराज शुम्भको शोकरहित और आह्लादित करो॥ ५८-६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये देवीपार्श्वे धूम्रलोचनदूतप्रेषणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे महाराज!] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया। तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं—धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों-जैसी बात करते हो। मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो॥ १-२॥
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः।<br>प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः॥ १<br><br>विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे।<br>वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन्॥ २
बलवान्बलसंयुक्तः प्रेषितोऽसि दुरात्मना।<br>कुरु युद्धं वृथा वादं मुञ्च मूढमतेऽधुना॥ ३हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भने तुझ बलवान्‌को सेनासे सुसज्जित करके युद्धहेतु भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थकी बातें छोड़ दो॥ ३॥
हत्वा शुम्भं निशुम्भञ्च त्वदन्यान्वा बलाधिकान्।<br>देवी क्रुद्धा शराघातैर्व्रजिष्यति निजालयम्॥ ४ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान् दैत्योंका अपने बाणोंके प्रहारसे संहार करके अपने धामको चली जायँगी॥ ४॥
क्वासौ मन्दमतिः शुम्भः क्व वा विश्वविमोहिनी।<br>अयुक्तः खलु संसारे विवाहविधिरेतयोः॥ ५कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ ये विश्वमोहिनी जगदम्बा! इन दोनोंका विवाह इस संसारमें सर्वथा अनुपयुक्त है॥ ५॥
सिंही किं त्वतिकामार्ता जम्बुकं कुरुते पतिम्।<br>करिणी गर्दभं वापि गवयं सुरभिः किमु॥ ६क्या अत्यधिक कामार्त होनेपर भी सिंहिनी सियारको, हथिनी किसी गर्दभको अथवा सुरभि किसी सामान्य वृषभको अपना पति बना सकती है?॥ ६॥
गच्छ शुम्भं निशुम्भं च वद सत्यं वचो मम।<br>कुरु युद्धं न चेद्याहि पाताल तरसाधुना॥ ७अब तुम शुम्भ-निशुम्भके पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो कि 'तुम मेरे साथ युद्ध करो; अन्यथा इसी समय शीघ्र पाताललोक चले जाओ'॥ ७॥
व्यास उवाच<br>कालिकाया वचः श्रुत्वा स दैत्यो धूम्रलोचनः।<br>तामुवाच महाभाग क्रोधसंरक्तलोचनः॥ ८**व्यासजी बोले—**हे महाभाग! देवी कालिकाका यह वचन सुनते ही वह दैत्य धूम्रलोचन क्रोधके मारे आँखें लाल करके उनसे कहने लगा—