देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 670 of 889
Read in contextPage 670
| अ० २४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य शुम्भो भ्रातुः कनीयसः ॥ ३५<br>कोपात्सम्प्रेषयामास पार्श्वस्थं धूम्रलोचनम्। | व्यासजी बोले—अपने छोटे भाईकी वह बात सुनकर शुम्भने पासमें ही बैठे हुए धूम्रलोचनको जानेके लिये क्रोधपूर्वक आदेश दिया॥ ३५ १/२॥ |
| शुम्भ उवाच<br>धूम्रलोचन गच्छाशु सैन्येन महतावृत्तः ॥ ३६<br>गृहीत्वानय तां मुग्धां स्ववीर्यमदमोहिताम्।<br>देवो वा दानवो वापि मनुष्यो वा महाबलः ॥ ३७<br>तत्पार्ष्णिग्राहतां प्राप्तो हन्तव्यस्तरसा त्वया।<br>तत्पार्श्ववर्तिनीं कालीं हत्वा संगृह्य तां पुनः ॥ ३८<br>शीघ्रमत्र समागच्छ कृत्वा कार्यमनुत्तमम्।<br>रक्षणीया त्वया साध्वी मुञ्चन्ती मृदुमार्गणाम् ॥ ३९<br>यत्नेन महता वीर मृदुदेहा कृशोदरी।<br>तत्सहायाश्च हन्तव्या ये रणे शस्त्रपाणयः ॥ ४०<br>सर्वथा सा न हन्तव्या रक्षणीया प्रयत्नतः। | शुम्भ बोला—हे धूम्रलोचन! तुम एक विशाल सेना लेकर अभी जाओ और अपने बलके मदमें चूर रहनेवाली उस मूढ़ स्त्रीको पकड़कर ले आओ। देवता, दानव या महाबली मनुष्य—कोई भी जो उसकी सहायताके लिये उपस्थित हो, उसे तुम तुरंत मार डालना। उसके साथमें रहनेवाली कालीको भी मारकर पुनः उस सुन्दरीको पकड़ करके और इस प्रकार मेरा यह अत्युत्तम कार्य सम्पन्नकर यहाँ शीघ्र आ जाओ। हे वीर! कोमल बाणोंको छोड़ती हुई उस सुकोमल शरीरवाली कृशोदरी साध्वी स्त्रीकी तुम प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना। हाथमें शस्त्र धारण किये हुए उसके जो भी सहायक रणमें हों, उन्हें मार डालना, किंतु उसे मत मारना; सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करना॥ ३६—४० १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्यादिष्टस्तदा राज्ञा तरसा धूम्रलोचनः ॥ ४१<br>प्रणम्य शुम्भं सैन्येन वृतः शीघ्रं ययौ रणे।<br>असाधूनां सहस्राणां षष्ट्या तेषां वृतस्तथा ॥ ४२ | व्यासजी बोले—अपने राजा शुम्भका यह आदेश पाकर धूम्रलोचन उसे प्रणाम करके सेना साथ लेकर तुरंत युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उसके साथमें साठ हजार राक्षस थे॥ ४१-४२॥ |
| स ददर्श ततो देवीं रम्योपवनसंस्थिताम्।<br>दृष्ट्वा तां मृगशावाक्षीं विनयेन समन्वितः ॥ ४३<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुमद्रसभूषितम्।<br>शृणु देवि महाभागे शुम्भस्त्वद्विरहातुरः ॥ ४४<br>दूतं प्रेषितवान्पार्श्वे तव नीतिविशारदः।<br>रसभङ्गभयोद्विग्नः सामपूर्वं त्वयि स्वयम् ॥ ४५ | वहाँ पहुँचकर उसने एक मनोहर उपवनमें विराजमान भगवती जगदम्बाको देखा। हरिणके बच्चेके समान नेत्रोंवाली देवीको देखकर वह विनम्रतापूर्वक उनसे मधुर, हेतुयुक्त तथा सरस वचन कहने लगा—हे महाभाग्यवती देवि! सुनो, शुम्भ तुम्हारे विरहसे अत्यन्त व्याकुल हैं। नीतिनिपुण महाराजने रसभंग होनेके भयसे उद्विग्न होकर शान्तिपूर्वक तुम्हारे पास स्वयं एक दूत भेजा था॥ ४३—४५॥ |
| तेनागत्य वचः प्रोक्तं विपरीतं वरानने।<br>वचसा तेन मे भर्ता चिन्ताविष्टमना नृपः ॥ ४६<br>बभूव रसमार्गज्ञे शुम्भः कामविमोहितः।<br>दूतेन तेन न ज्ञातं हेतुगर्भं वचस्तव ॥ ४७<br>यो मां जयति संग्रामे यदुक्तं कठिनं वचः।<br>न ज्ञातस्तेन संग्रामो द्विविधः खलु मानिनि ॥ ४८ | हे सुमुखि! उसने लौटकर विपरीत बात कह दी। उस बातसे मेरे स्वामी महाराज शुम्भके मनमें बहुत चिन्ता व्याप्त हो गयी है। हे रसतत्त्वको जाननेवाली! शुम्भ इस समय कामसे विमोहित हो गये हैं। वह दूत तुम्हारे सहेतुक वचनोंको नहीं समझ सका। तुमने जो यह कठिन वचन कहा था कि 'जो मुझे संग्राममें जीतेगा', उस संग्रामका |