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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 667 of 889

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Page 667
६५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४
श्लोकअर्थ
इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे।<br>तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि॥ २हे भामिनि! हे देवि! जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्योंको पराजित कर दिया है, उन्हें तुम संग्राममें जीतनेकी अभिलाषा कैसे रखती हो?॥ २॥
त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत्।<br>का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम्॥ ३त्रिलोकीमें वैसा कोई नहीं है, जो शुम्भको संग्राममें जीत सके; तब हे कमलसदृश नेत्रोंवाली! तुम कौन-सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्धमें उनके सामने टिक सको?॥ ३॥
अविचार्य न वक्तव्यं वचनं क्वापि सुन्दरि।<br>बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम्॥ ४हे सुन्दरि! बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिये, अपितु अपने तथा शत्रुके बलको जानकर ही समयके अनुसार बोलना चाहिये॥ ४॥
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः।<br>त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये॥ ५तीनों लोकोंके अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूपपर मोहित हो गये हैं और तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं। अतः हे प्रिये! उनका मनोरथ पूर्ण करो॥ ५॥
त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम।<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते॥ ६मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बातको मान करके तुम शुम्भ अथवा निशुम्भ किसीको [पतिरूपमें] स्वीकार कर लो; मैं तुम्हारे लिये यह हितकर बात कह रहा हूँ॥ ६॥
शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा।<br>सेवनीयो बुद्धिमद्भिर्नवानामुत्तमो यतः॥ ७सभी बुद्धिमान् प्राणियोंको चाहिये कि बड़े हर्षके साथ शृंगाररसका उपभोग करें; क्योंकि यह सभी नौ रसोंमें उत्तम माना गया है॥ ७॥
नागमिष्यसि चेद् बाले संक्रुद्धः पृथिवीपतिः।<br>अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम्॥ ८हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य बहुत-से सेवकोंको अभी भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वाकर ले जायँगे॥ ८॥
केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः।<br>त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्निधौ॥ ९हे वामोरु! वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर बलपूर्वक तुम्हें निश्चय ही शुम्भके पास ले जायँगे॥ ९॥
स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज।<br>मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै॥ १०अतः हे कोमलांगी! अपनी लज्जाकी रक्षा करो और इस दुस्साहसको पूर्णरूपसे छोड़ दो। तुम सम्मानित होकर उनके पास चलो; क्योंकि तुम सम्मानकी पात्र हो॥ १०॥
क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम्।<br>सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु॥ ११<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा लप्स्यसि परमं सुखम्।कहाँ तीक्ष्ण बाणोंसे होनेवाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ासे उत्पन्न होनेवाला सुख! सार-असार बातपर सही-सही विचार करके तुम मेरे हितकर वचनको मान लो और शुम्भ अथवा निशुम्भको अपना पति स्वीकार कर लो; इससे तुम परम सुख प्राप्त करोगी॥ ११ १/२ ॥