देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 665 of 889
Read in contextPage 665
| ६५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्वमाज्ञापय रम्भोरु तत्करोमि वशानुगः।<br>दासोऽहं तव चार्वङ्गि रक्ष मां कामबाणतः॥ ४५ | हे रम्भोरु ! मैं तुम्हारे अधीन हूँ, तुम मुझे जो भी आज्ञा प्रदान करो, उसे मैं करूँगा। हे सुन्दर अंगोंवाली ! मैं तुम्हारा दास हूँ, कामबाणसे मेरी रक्षा करो॥ ४५॥ |
| भज मां त्वं मरालाक्षि तवाधीनं स्मराकुलम्।<br>त्रैलोक्यस्वामिनी भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ४६ | हे मरालाक्षि ! तुम्हारे अधीन हुए मुझ कामातुरको तुम स्वीकार कर लो और तीनों लोकोंकी स्वामिनी बनकर उत्कृष्ट सुखोंका उपभोग करो॥ ४६॥ |
| तव चाज्ञाकरः कान्ते भवामि मरणावधि।<br>अवध्योऽस्मि वरारोहे सदेवासुरमानुषैः॥ ४७<br><br>सदा सौभाग्यसंयुक्ता भविष्यसि वरानने।<br>यत्र ते रमते चित्तं तत्र क्रीडस्व सुन्दरि॥ ४८ | हे कान्ते ! मैं मरणपर्यन्त तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा। हे वरारोहे ! मैं देवता, असुर तथा मनुष्योंसे अवध्य हूँ। हे सुमुखि ! [ मुझे पति बनाकर] तुम सदा सौभाग्यवती रहोगी। हे सुन्दरि ! जहाँ तुम्हारा मन लगे, वहाँ विहार करना॥ ४७-४८॥ |
| इति तस्य वचश्चित्ते विमृश्य मदमन्थरे।<br>वक्तव्यं यद्भवत्प्रेम्णा तद् ब्रूहि मधुरं वचः॥ ४९<br><br>शुम्भाय चञ्चलापाङ्गि तद् ब्रवीम्यहमाशु वै। | मदसे अलसायी हुई हे कामिनि ! [ मेरे स्वामी] उन शुम्भकी बातपर अपने मनमें भलीभाँति विचार करके तुम्हें जो कुछ कहना हो, उसे प्रेमपूर्वक मधुर वाणीमें कहो। हे चंचल कटाक्षवाली ! मैं वह सन्देश तुरंत शुम्भसे निवेदन करूँगा॥ ४९ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>तद्दूतवचनं श्रुत्वा स्मितं कृत्वा सुपेशलम्॥ ५०<br><br>तं प्राह मधुरां वाचं देवी देवार्थसाधिका। | व्यासजी बोले—दूतका वह वचन सुनकर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली भगवती अत्यन्त मधुर मुसकान करके मीठी वाणीमें उससे कहने लगीं॥ ५० ½॥ |
| देव्युवाच<br>जानाम्यहं निशुम्भं च शुम्भं चातिबलं नृपम्॥ ५१<br><br>जेतारं सर्वदेवानां हन्तारञ्चैव विद्विषाम्।<br>राशिं सर्वगुणानाञ्च भोक्तारं सर्वसम्पदाम्॥ ५२<br><br>दातारं चातिशूरं च सुन्दरं मन्मथाकृतिम्।<br>द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तमवध्यं सुरमानुषैः॥ ५३<br><br>ज्ञात्वा समागतास्म्यत्र द्रष्टुकामा महासुरम्।<br>रत्नं कनकमायाति स्वशोभाधिकवृद्धये॥ ५४ | देवी बोलीं—मैं महाबली राजा शुम्भ तथा निशुम्भ—दोनोंको जानती हूँ। उन्होंने सभी देवताओंको जीत लिया है और अपने शत्रुओंका संहार कर डाला है, वे सभी गुणोंकी राशि हैं और सब सम्पदाओंका भोग करनेवाले हैं। वे दानी, महापराक्रमी, सुन्दर, कामदेवसदृश रूपवाले, बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न और देवताओं तथा मनुष्योंसे अवध्य हैं—यह जानकर मैं उस महान् असुरको देखनेकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। जैसे रत्न अपनी शोभाको और अधिक बढ़ानेके लिये सुवर्णके पास आता है, वैसे ही मैं अपने पतिको देखनेके लिये दूरसे यहाँ आयी हूँ॥ ५१—५४ ½॥ |
| तत्राहं स्वपतिं द्रष्टुं दूरादेवागतास्मि वै।<br>दृष्टा मया सुराः सर्वे मानवा भुवि मानदाः॥ ५५<br><br>गन्धर्वा राक्षसाश्चान्ये ये चातिप्रियदर्शनाः।<br>सर्वे शुम्भभयाद्भीता वेपमाना विचेतसः॥ ५६ | सभी देवताओं, पृथ्वीलोकमें मान प्रदान करनेवाले सभी मनुष्यों, गन्धर्वों, राक्षसों तथा देखनेमें सुन्दर लगनेवाले जो भी अन्य लोग हैं; उन सबको मैंने देख लिया है। सब-के-सब शुम्भके आतंकसे डरे हुए हैं, भयके मारे काँपते रहते हैं और सदा व्याकुल रहते हैं॥ ५५-५६॥ |