देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 663 of 889
Read in contextPage 663
| ६५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमानं वैधसं दिव्यं मरालध्वजसंयुतम्।<br>त्वयात्तं रत्नभूतं तद्वलेन नृप चाद्भुतम्॥ २२ | हे नृप! आपने ब्रह्माजीके हंसध्वजसम्पन्न, दिव्य तथा रत्नमय अद्भुत विमानको बलपूर्वक अपने अधिकारमें कर लिया॥ २२॥ |
| कुबेरस्य निधिः पद्मास्त्वया राजन् समाहृतः।<br>छत्रं जलपतेः शुभ्रं गृहीतं तत्त्वया बलात्॥ २३ | हे राजन्! आपने बलपूर्वक कुबेरकी पद्म नामक निधिको छीन लिया है और वरुणके श्वेत छत्रको अपने अधिकारमें कर लिया है॥ २३॥ |
| पाशश्चापि निशुम्भेन भ्रात्रा तव नृपोत्तम।<br>गृहीतोऽस्ति हठात्कामं वरुणस्य जितस्य च॥ २४ | हे नृपश्रेष्ठ! आपके भाई निशुम्भने भी वरुणको पराजित करके उसके पाशको हठपूर्वक छीन लिया है॥ २४॥ |
| अम्लानपङ्कजां तुभ्यं मालां जलनिधिर्ददौ।<br>भयात्तव महाराज रत्नानि विविधानि च॥ २५ | हे महाराज! आपके भयसे समुद्रने कभी भी न मुरझानेवाली कमल-पुष्पोंकी माला और विविध प्रकारके रत्न आपको प्रदान किये हैं॥ २५॥ |
| मृत्योः शक्तिर्यमस्यापि दण्डः परमदारुणः।<br>त्वया जित्वा हतः कामं किमन्यद्वर्ण्यते नृप॥ २६<br><br>कामधेनुर्गृहीताद्य वर्तते सागरोद्भवा।<br>मेनकाद्या वशे राजंस्तव तिष्ठन्ति चाप्सराः॥ २७ | आपने मृत्युको जीतकर उसकी शक्तिको तथा यमराजको जीतकर उसके अति भीषण दण्डको अपने पूर्ण अधिकारमें कर लिया है। हे राजन्! आपके पराक्रमका और क्या वर्णन किया जाय? समुद्रसे प्रादुर्भूत कामधेनु आपने छीन ली, जो इस समय आपके पास विद्यमान है। हे राजन्! मेनका आदि अप्सराएँ भी आपके अधीन पड़ी हुई हैं॥ २६-२७॥ |
| एवं सर्वाणि रत्नानि त्वयात्तानि बलादपि।<br>कस्मान्न गृह्यते कान्तरत्नमेषा वराङ्गना॥ २८ | इस प्रकार जब आपने सभी रत्न बलपूर्वक छीन लिये हैं, तब नारियोंमें रत्नस्वरूपा इस सुन्दरीको भी अपने अधिकारमें क्यों नहीं कर लेते?॥ २८॥ |
| सर्वाणि ते गृहस्थानि रत्नानि विशदान्यथ।<br>अनया सम्भविष्यन्ति रत्नभूतानि भूपते॥ २९ | हे भूपते! आपके गृहमें विद्यमान समस्त विपुल रत्न इस सुन्दरीसे सुशोभित होकर यथार्थरूपमें रत्नस्वरूप हो जायँगे॥ २९॥ |
| त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्र नेदृशी वर्तते प्रिया।<br>तस्मात्तामानयाशु त्वं कुरु भार्या मनोहराम्॥ ३० | हे दैत्यराज! तीनों लोकोंमें ऐसी सुन्दरी स्त्री नहीं है। अतः आप उस मनोहारिणी स्त्रीको शीघ्र ले आइये और अपनी भार्या बना लीजिये॥ ३०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं मधुरं मधुराक्षरम्।<br>प्रसन्नवदनः प्राह सुग्रीवं सन्निधौ स्थितम्॥ ३१ | व्यासजी बोले— चण्ड-मुण्डके मधुमय अक्षरोंसे युक्त यह मधुर वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डल-वाला शुम्भ अपने समीपमें बैठे हुए सुग्रीवसे कहने लगा— ॥ ३१॥ |
| गच्छ सुग्रीव दूतत्वं कुरु कार्यं विचक्षण।<br>वक्तव्यञ्च तथा तत्र यथाभ्येति कृशोदरी॥ ३२ | हे बुद्धिसम्पन्न सुग्रीव! तुम दूत बनकर जाओ और मेरा यह कार्य सम्पन्न करो। वहाँ तुम ऐसी बातचीत करना, जिससे वह कृशोदरी यहाँ आ जाय॥ ३२॥ |
| उपायौ द्वौ प्रयोक्तव्यौ कान्तासु सुविचक्षणैः।<br>सामदाने इति प्राहुः शृङ्गाररसकोविदाः॥ ३३ | बुद्धिमान् पुरुषोंको स्त्रियोंके विषयमें साम और दान—इन दो उपायोंका प्रयोग करना चाहिये—ऐसा शृंगाररसके विद्वानोंने कहा है॥ ३३॥ |