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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 661 of 889

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Page 661

६५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य, देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड-मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुम्भका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे राजन्!] तब शत्रुओंसे
एवं स्तुता तदा देवी दैवतैः शत्रुतापितैः।<br>स्वशरीरात्परं रूपं प्रादुर्भूतं चकार ह॥ १सन्त्रस्त देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवतीने अपने शरीरसे एक दूसरा रूप प्रकट कर दिया॥ १॥
पार्वत्यास्तु शरीराद्वै निःसृता चाम्बिका यदा।<br>कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु पठ्यते॥ २जब भगवती पार्वतीके विग्रहकोशसे अम्बिका प्रकट हुईं, तब वे सम्पूर्ण जगत्में ‘कौशिकी’ इस नामसे कही जाने लगीं। पार्वतीके शरीरसे उन भगवती कौशिकीके निकल जानेसे शरीर क्षीण हो जानेके कारण वे पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं। अतः वे कालिका नामसे विख्यात हुईं॥ २-३॥
निःसृतायां तु तस्यां सा पार्वती तनुव्यत्ययात्।<br>कृष्णरूपाथ सञ्जाता कालिका सा प्रकीर्तिता॥ ३
मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी।<br>कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा॥ ४वे कालिका स्याहीके समान काले वर्णकी थीं तथा महाभयंकर प्रतीत होती थीं। दैत्योंके लिये भयवर्धिनी तथा [भक्तोंके लिये] समस्त मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे भगवती ‘कालरात्रि’ इस नामसे पुकारी जाने लगीं॥ ४॥
अम्बिकायाः परं रूपं विरराज मनोहरम्।<br>सर्वभूषणसंयुक्तं लावण्यगुणसंयुतम्॥ ५समस्त आभूषणोंसे मण्डित और लावण्यगुणसे सम्पन्न वह भगवतीका दूसरा रूप (कौशिकी) अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था॥ ५॥
ततोऽम्बिका तदा देवानित्युवाच ह सस्मिता।<br>तिष्ठन्तु निर्भया यूयं हनिष्यामि रिपूनिह॥ ६तदनन्तर अम्बिकाने मुसकराकर देवताओंसे यह कहा—आपलोग निर्भय रहें, मैं आपके शत्रुओंका वध अभी कर डालूँगी। आपलोगोंका कार्य मुझे सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न करना है। मैं समरांगणमें विचरण करूँगी और आपलोगोंके कल्याणके लिये निशुम्भ आदि दानवोंका संहार करूँगी॥ ६-७॥
कार्यं वः सर्वथा कार्यं विहरिष्याम्यहं रणे।<br>निशुम्भादीन्वधिष्यामि युष्माकं सुखहेतवे॥ ७
इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढा मदोत्कटा।<br>कालिकां पार्श्वतः कृत्वा जगाम नगरे रिपोः॥ ८तब ऐसा कहकर गर्वोन्मत्त वे भगवती कौशिकी सिंहपर सवार हो गयीं और देवी कालिकाको साथमें लेकर शत्रुके नगरकी ओर चल पड़ीं॥ ८॥
सा गत्वोपवने तस्थावम्बिका कालिकाान्विता।<br>जगावथ कलं तत्र जगन्मोहनमोहनम्॥ ९कालिकासहित देवी अम्बिका वहाँ पहुँचकर नगरके उपवनमें रुक गयीं। तत्पश्चात् उन्होंने जगत्‌को मोहमें डालनेवालेको भी मोहित करनेवाला गीत गाना आरम्भ कर दिया॥ ९॥