देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| ६५० | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० २२ |
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| किमपरस्य नरस्य कथानकै-<br>स्तव पदाब्जयुगं न भजन्ति के।<br>विगतरागगृहाश्च दयां क्षमां<br>कृतधियो मुनयोऽपि भजन्ति ते॥ ४० | मनुष्यकी बात ही क्या! आपके चरणकमलोंकी आराधना कौन नहीं करते? घर-गृहस्थीसे विरक्त बुद्धिमान् मुनिगण भी दया और क्षमारूपमें प्रतिष्ठित आप भगवतीकी उपासना करते हैं॥ ३९-४०॥ |
| देवि त्वदङ्घ्रिभजने न जना रता ये<br>संसारकूपपतिताः पतिताः किलामी।<br>ते कुष्ठगुल्मशिरआधियुता भवन्ति<br>दारिद्र्यदैन्यसहिता रहिताः सुखौघैः॥ ४१ | हे देवि! जो लोग आपके चरणोंकी उपासनामें संलग्न नहीं रहते, उन्हें निश्चय ही इस संसाररूप अगाध कूपमें गिरना पड़ता है। वे पतित लोग कुष्ठ, गुल्म और शिरोरोगसे ग्रस्त रहते हैं, दरिद्रता तथा दीनतासे युक्त रहते हैं और सुखोंसे सदा वंचित रहते हैं॥ ४१॥ |
| ये काष्ठभारवहने यवसावहारे<br>कार्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः।<br>जानीमहेऽल्पमतिभिर्भवदङ्घ्रिसेवा<br>पूर्वे भवे जननि तैर्न कृता कदापि॥ ४२ | हे माता! धन और स्त्रीसे रहित जो मनुष्य लकड़ीका बोझ ढोने और तृण आदिका वहन करनेमें लगे हैं, [उनके विषयमें] हम तो यही समझते हैं कि उन मन्दबुद्धि मनुष्योंने पूर्वजन्ममें आपके चरणोंकी उपासना कभी नहीं की॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैः सर्वैरम्बिका करुणान्विता।<br>प्रादुर्बभूव तरसा रूपयौवनसंयुता॥ ४३<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>दिव्यमाल्यसमायुक्ता दिव्यचन्दनचर्चिता॥ ४४<br><br>जगन्मोहनलावण्या सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अद्वितीयस्वरूपा सा देवानां दर्शनं गता॥ ४५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार समस्त देवताओंके स्तुति करनेपर अम्बिका करुणासे ओत-प्रोत होकर तुरंत प्रकट हो गयीं। [उस समय] वे भगवती रूप तथा यौवनसे सम्पन्न थीं, उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था, वे अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य मालाओंसे सुशोभित हो रही थीं, दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त थीं, जगत्को मोहित कर देनेवाले सौन्दर्यसे सम्पन्न थीं और समस्त शुभ लक्षणोंसे समन्वित थीं। इस प्रकार अद्वितीय स्वरूपवाली वे भगवती देवताओंके समक्ष प्रकट हुईं॥ ४३—४५॥ |
| जाह्नव्यां स्नातुकामा सा निर्गता गिरिगुहरात्।<br>दिव्यरूपधरा देवी विश्वमोहनमोहिनी॥ ४६ | दिव्य रूप धारण करनेवाली तथा विश्वको मोह लेनेमें समर्थ कामदेवको भी मोहित करनेवाली वे भगवती गंगामें स्नान करनेकी अभिलाषासे पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली थीं॥ ४६॥ |
| देवान्स्तुतिपरानाह मेघगम्भीरया गिरा।<br>प्रेमपूर्वं स्मितं कृत्वा कोकिलामञ्जुवादिनी॥ ४७ | कोकिलके समान मधुर बोलनेवाली भगवती प्रेमपूर्ण भावसे मुसकराकर स्तुति करनेमें संलग्न देवताओंसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने लगीं॥ ४७॥ |
| देव्युवाच<br>भो भोः सुरवराः कात्र भवद्भिः स्तूयते भृशम्।<br>किमर्थं ब्रूत वः कार्यं चिन्ताविष्टाः कुतः पुनः॥ ४८ | देवी बोलीं— हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग यहाँपर इतनी बड़ी स्तुति किसलिये कर रहे हैं? आपलोग इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल क्यों हैं? मुझे अपना कार्य बताइये॥ ४८॥ |