देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 653 of 889
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६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| सम्भवन्ति तदाकारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः।<br>युद्धं पुनस्ते कुर्वन्ति पुरुषा रक्तसम्भवाः॥ ३७<br>अतः सोऽपि महावीर्यः संग्रामेऽतीव दुर्जयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां रक्तबीजो महासुरः॥ ३८ | और वे सभी पुनः युद्ध करने लगते थे। इसलिये संग्राममें महापराक्रमी तथा अजेय समझा जानेवाला वह महान् असुर रक्तबीज सभी प्राणियोंसे अवध्य हो गया था॥ ३४-३८॥ |
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| अन्ये च बहवः शूराश्चतुरङ्गसमन्विताः।<br>शुम्भञ्च नृपतिं मत्वा बभूवुस्तस्य सेवकाः॥ ३९ | इसके अतिरिक्त चतुरंगिणी सेनासे युक्त अन्य बहुत-से पराक्रमी दानव भी शुम्भको अपना राजा मानकर उसके सेवक बन गये॥ ३९॥ |
| असंख्याता तदा जाता सेना शुम्भनिशुम्भयोः।<br>पृथिव्याः सकलं राज्यं गृहीतं बलवत्तया॥ ४० | उस समय शुम्भ और निशुम्भके पास असंख्य सेना हो गयी थी और उन्होंने अपने बलके प्रभावसे भूमण्डलका सम्पूर्ण राज्य अपने अधिकारमें कर लिया॥ ४०॥ |
| सेनायोगं तदा कृत्वा निशुम्भः परवीरहा।<br>जगाम तरसा स्वर्गे शचीपतिजयाय च॥ ४१<br>चकारासौ महायुद्धं लोकपालैः समन्ततः।<br>वृत्रहा वज्रपातेन ताडयामास वक्षसि॥ ४२<br>स वज्राभिहतो भूमौ पपात दानवानुजः।<br>भग्नं बलं तदा तस्य निशुम्भस्य महात्मनः॥ ४३ | तत्पश्चात् शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले निशुम्भने अपनी सेना सुसज्जित करके इन्द्रको जीतनेहेतु बड़े वेगसे स्वर्गके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] उसने लोकपालोंके साथ घोर युद्ध किया। तब इन्द्रने उसके वक्षपर वज्रसे प्रहार किया। उस वज्राघातसे आहत होकर दानव शुम्भका छोटा भाई निशुम्भ भूमिपर गिर पड़ा। तब परम साहसी उस निशुम्भकी सेना भाग गयी॥ ४१-४३॥ |
| भ्रातरं मूर्च्छितं श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः।<br>तत्रागत्य सुरान्सर्वांस्ताडयामास सायकैः॥ ४४ | अपने भाईको मूर्च्छित हुआ सुनकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला शुम्भ वहाँ आकर सभी देवताओंको बाणोंसे मारने लगा॥ ४४॥ |
| कृतं युद्धं महत्तेन शुम्भेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निर्जितास्तु सुराः सर्वे सेन्द्राः पालाश्च सर्वशः॥ ४५ | इस प्रकार किसी भी कार्यको कठिन न समझनेवाले उस शुम्भने भीषण युद्ध किया और इन्द्रसहित सभी देवताओं तथा लोकपालोंको पराजित कर दिया॥ ४५॥ |
| ऐन्द्रं पदं तदा तेन गृहीतं बलवत्तया।<br>कल्पपादपसंयुक्तं कामधेनुसमन्वितम्॥ ४६<br>त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृतास्तेन महात्मना।<br>नन्दनं च वनं प्राप्य मुदितोऽभून्महासुरः॥ ४७<br>सुधायाश्चैव पानेन सुखमाप महासुरः। | तब उस शुम्भने अपने पराक्रमके प्रभावसे कल्पवृक्ष और कामधेनुसहित इन्द्रपदको अधिकारमें कर लिया। उस दुस्साहसी शुम्भने तीनों लोकोंपर आधिपत्य जमा लिया और देवताओंको मिलनेवाले यज्ञभागोंका हरण कर लिया। नन्दनवन पा करके वह महान् असुर आनन्दित हुआ और अमृतके पानसे उसे बहुत सुख मिला॥ ४६-४७ ½॥ |
| कुबेरं स च निर्जित्य तस्य राज्यं चकार ह॥ ४८<br>अधिकारं तथा भानोः शशिनश्च चकार ह।<br>यमञ्चैव विनिर्जित्य जग्राह तत्पदं तथा॥ ४९<br>वरुणस्य तथा राज्यं चकार वह्निकर्म च।<br>वायोः कार्यं निशुम्भश्च चकार स्वबलान्वितः॥ ५० | उसने कुबेरको जीतकर उनके राज्यपर अधिकार कर लिया और सूर्य तथा चन्द्रमाका भी अधिकार छीन लिया। उसने यमराजको परास्त करके उनका पद स्वयं ले लिया। इसी प्रकार अपने बलके प्रभावसे वरुणका राज्य अपने अधीन करके वह शुम्भ राज्य-शासन स्वयं करने लगा और अग्नि तथा वायुके कार्य स्वयं करने लगा॥ ४८-५०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 D