देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 650 of 889
Read in contextPage 650
| अ० २१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यथा शुम्भो निशुम्भश्च भ्रातरौ बलवत्तरौ।<br>बभूवतुर्महावीरौ अवध्यौ पुरुषैः किल॥ २ | [पूर्वकालमें] शुम्भ और निशुम्भ नामक दो [असुर] भाई थे। वे बड़े बलवान्, महापराक्रमी तथा पुरुषोंसे अवध्य थे॥ २॥ |
| बहुसेनावृतौ शूरौ देवानां दुःखदौ सदा।<br>दुराचारौ मदोत्सिक्तौ बहुदानवसंयुतौ॥ ३ | उनके पास बहुत-से सैनिक थे। वे दोनों वीर देवताओंको सदा दुःख देते रहते थे। वे बड़े दुराचारी तथा मदमत्त थे। उनके पास बहुत अधिक दानव थे॥ ३॥ |
| हतावम्बिकया तौ तु संग्रामेऽतीव दारुणे।<br>देवानाञ्च हितार्थाय सर्वैः परिचरैः सह॥ ४ | अम्बिकाने देवताओंके हितके लिये उन दोनों दानवोंको उनके परिचरोंसमेत अत्यन्त भीषण संग्राममें मार डाला॥ ४॥ |
| चण्डमुण्डौ महाबाहू रक्तबीजोऽतिदारुणः।<br>धूम्रलोचननामा च निहतास्ते रणाङ्गणे॥ ५ | महाबाहु चण्ड-मुण्ड, महाभयंकर रक्तबीज और धूम्रलोचन नामक असुर—वे सब भी भगवतीके द्वारा रणभूमिमें मारे गये थे॥ ५॥ |
| तान्निहत्य सुराणां सा जहार भयमुत्तमम्।<br>स्तुता सम्पूजिता देवैर्गिरौ हेमाचले शुभे॥ ६ | उन सबका वध करके भगवती अम्बिकाने देवताओंका बहुत बड़ा भय दूर कर दिया। तदनन्तर देवताओंने पवित्र सुमेरुपर्वतपर उन देवीका स्तवन तथा विधिवत् पूजन किया॥ ६॥ |
| राजोवाच<br>कावेतावसुरावादौ कथं तौ बलिनां वरौ।<br>केन संस्थापितौ चेह स्त्रीवध्यत्वं कुतो गतौ॥ ७<br><br>तपसा वरदानेन कस्य जातौ महाबलौ।<br>कथञ्च निहतौ सर्वं कथयस्व सविस्तरम्॥ ८ | राजा बोले— पूर्वकालमें ये दोनों दानव कौन थे, वे बड़े-बड़े बलशालियोंसे भी श्रेष्ठ कैसे हुए, उन्हें राजसिंहासनपर किसने प्रतिष्ठित किया, स्त्रीके द्वारा वे कैसे मारे गये, किस देवताकी तपस्याके परिणामस्वरूप प्राप्त वरदानसे वे महाबली हुए? और किस प्रकार वे मारे गये? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये॥ ७-८॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>देव्याश्चरितसंयुक्तां सर्वार्थफलदां शुभाम्॥ ९ | व्यासजी बोले— हे राजन्! अब आप समस्त पापोंका नाश करनेवाली, सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली, मंगलमयी तथा भगवतीके चरित्रसे ओत-प्रोत दिव्य कथा सुनिये॥ ९॥ |
| पुरा शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ भूममण्डले।<br>पातालतश्च सम्प्राप्तौ भ्रातरौ शुभदर्शनौ॥ १० | पूर्वकालमें शुम्भ-निशुम्भ नामक दो दैत्य पातालसे भूमण्डलपर आ गये। वे दोनों भाई देखनेमें बड़े सुन्दर थे॥ १०॥ |
| तौ प्राप्तयौवनौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम्।<br>अन्नोदकं परित्यज्य पुष्करे लोकपावने॥ ११ | पूर्ण वयस्क होनेपर उन दोनोंने जगत्पावन पुष्कर तीर्थमें अन्न तथा जलका परित्याग करके कठोर तप आरम्भ कर दिया॥ ११॥ |
| वर्षाणामयुतं यावद्योगविद्यापरायणौ।<br>एकत्रैवासनं कृत्वा तेपाते परमं तपः॥ १२ | योगसाधनामें तत्पर रहनेवाले शुम्भ और निशुम्भ एक ही स्थानपर आसन लगाकर दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करते रहे॥ १२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 A