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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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२४६ दशकुमारचरितम्। [ उत्तरपीठिकायां
स्निग्धदीर्घां दृष्टिम् 'आचष्टां भवानात्मीयचरितम्' इत्यादिदेश। सोऽपि
बद्धाञ्जलिरभिदधे—
इति श्रीदण्डिनः कृतौ दशकुमारचरित उपहारवर्मचरितं नाम
तृतीय उच्छ्वासः।
अभ्युपैति-प्राप्नोति। अर्थपालमुखे-अर्थपालस्य कुमारेष्वन्यतमस्य मुखे आन-
ने। निधाय- संस्थाप्य। स्निग्धदीर्घां-स्निग्धां स्नेहपूर्णामाग्रहातिशयेन दीर्घां च।
आचष्टां-कथयतु। आङ्पूर्वाच्चक्ष्धातोर्लोटि रूपम्। आत्मीयचरितं स्ववृत्तान्तम्।
सोऽपि-अर्थपालोऽपि। अभिदधे-उवाच।
इति श्रीताराचरणभट्टाचार्यकृतायां बालविबोधिनीसमाख्यायां श्रीदशकुमार-
चरित-व्याख्यायामुपहारवर्मचरितं नाम तृतीयोच्छ्वासः।
अपहरण पाप नहीं है ।) ठीक ही है, ऐसी कौनसी कृति है जो बुद्धिमान पुरुषोंके द्वारा
की जानेपर शोभाको न प्राप्त करे । (-बुद्धिमानोंके द्वारा बुरा कार्य भी भले प्रकारसे
होता है।) इसके पश्चात् राजवाहनने आग्रहपूर्वक स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे अर्थपालकी ओर
देखा और कहा—'आप भी अपनी चरितावली सुनायें।'
इस प्रकार बालक्रीडानामक हिन्दी टीका समाप्त हुई ।