चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context७० चरकसंहिता [ अ० ५
पुरुषोऽयं लोकसंमित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो
हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो
लोके, इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतावता वाक्ये-
नोक्तं वाक्यार्थमवगाह्यामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमनुव्याख्यायमानं
शुश्रूषामहे— इति ।
ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने उपदेश किया है कि यह पुरुष लोक
के तुल्य है, लोक में जितने भी विशेष भाव (पदार्थ) है, वे सब इस पुरुष
(शरीर) मे हैं, और जितनी बाते इस पुरुष मे हैं, उतनी ही सब लोक
में हैं, इस प्रकार कहते हुए भगवान् पुनर्वसु को शिष्य अग्निवेश ने कहा—
हे भगवन् ! इतना कह देने से ही हम सम्पूर्ण वाक्यार्थ नही समझ
सकते । हे भगवन् ! आपकी बुद्धि से हम अधिक विस्तार में इसको सुनना
चाहते हैं ।
तमुवाच भगवानात्रेयः—अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरु-
षावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येया । तेषा यथास्थूलं भावान् सामान्य-
मभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेक मना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्नि-
वेश ! षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्द लभन्ते । तद्यथा—पृथिव्या-
पस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समु-
दिताः 'पुरुष' इति शब्दं लभन्ते ॥ ३ ॥
इस पर अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—लोक के विशेष अवयव
(वृक्ष, तृण, पशु आदि) तथा पुरुष के विशेष अवयव (स्नायु, कण्डरा,
धमनी आदि) भी असख्य हैं। परन्तु यहा पर मोटी माटी बातो का सामान्य
रूप से दिग्दर्शन करायेगे । हे अग्निवेश ! उनका वर्णन एकाग्र-चित्त होकर
ध्यान से सुनो ! छ धातुऐ मिलकर एक समुदाय 'पुरुष' नाम से कहे जाते
हैं । अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और अव्यक्त ब्रह्म । इन छ
धातु का समुदाय मिलकर 'पुरुष' ऐसा कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्ति', आपः क्लेदः, तेजोऽभिसंतापो, वायुः
प्राणो, वियच्छिषिराणि, ब्रह्माऽन्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके
तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापति-
रन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्व, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः,
आदित्यस्तु आदान, रुद्रो रोषः, सोमःप्रसादो, वसवः सुखम्, अश्विनौ
कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च,
तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं,