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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 76

अ० ४ ] शारीरस्थानम् ६१
षष्ठे मासि गर्भस्य बलवर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः ।
तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण ॥ २२ ॥
छठे महिने में और मासों की अपेक्षा गर्भ में बल और वर्ण की वृद्धि विशेष
रूप से होती है । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर बल और वर्ण की
विशेष हानि होती है ॥ २२ ॥
सप्तमे मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वो-
त्कारैः क्लान्ततमा भवति ॥ २३ ॥
सातवें मास मे गर्भ मे मास, रक्त आदि सब पदार्थ एक साथ बढ़ते हैं ।
इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर मास, रक्त आदि सब प्रकार से घट
जाते हैं, अतः वह सब प्रकार से कृश हो जाती है ॥ २३ ॥
अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवा-
हिनीभिर्मुहुरोजः परस्परत आददातेग र्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा
गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदा युक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मा-
त्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्, त चैवमभि-
समीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः ॥ २४ ॥
आठवे मास में रस को ले जाने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा ओज माता
से गर्भ में और गर्भ से माता मे बार बार कभी इधर कभी उधर परस्पर आता
जाता रहता है । क्योंकि इस समय गर्भ असम्पूर्ण रहता है । इसलिये इस समय
गर्भिणी बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होती है । इसी प्रकार गर्भ भी
बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होता है । जिस समय ओज माता मे रहता
है तब माता प्रसन्न और गर्भ म्लान और जब ओज गर्भ में रहता है उस समय
गर्भ प्रसन्न और माता म्लान रहती है । इसलिये ओज के स्थिर न होने से
गर्भ का जन्म आपत्तिजनक होता है । इस मास में जन्मा हुआ गर्भ निश्चित
रूप में जीवित उत्पन्न नही होता । गर्भ में ओज हो तब यदि गर्भ बाहर आये
तो बालक जीवित बाहर आता है, परन्तु माता की मृत्यु होना सम्भव है ।
यदि ओज माता में हो तब गर्भ बाहर आये तो मृत बालक बाहर आता है ।
इस दृष्टि से ज्ञानी पुरुष आठवे मास को गर्भिणी के सामने नही गिनते । क्योंकि
यदि इसी मास की उत्पत्ति को गर्भिणी सुन ले तो सम्भवतः डर जाये । इस
भय के कारण वायु कुपित होकर गर्भ का नाश कर सकता है ॥ २४ ॥
तस्मिन्नेकदिवसातिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकाळ-
मित्याहुरादशमान्मासात्, एतावान्कालः, परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य ॥२५॥