चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
Page 72 of 616
Read in contextPage 72
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५७
रसो रसन शत्य मार्दवः स्नेहः क्लेदश्च । पृथिव्यात्मक गन्धो घ्राण
गौरवं स्थैर्यं मूर्तिश्च ॥ १३ ॥
गर्भ के अंग और अवयवों में से कुछ अवयव जो कि माता आदि से उत्पन्न
होते हैं, प्रथम कह चुके हैं । उन प्रथम कहे हुए अवयवों को भी अब दूसरे
प्रकार से महाभूतों का प्रविभाग करते हुए क्रम से प्राप्त तथा अन्य न कहे हुए
अंगों ( अवयवों ) का भी वर्णन करेंगे ।
माता आदि से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयव भी पांचों महाभूतों के
विकार ही हैं । इनमें इस गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, अति सूक्ष्मता और
विवेक ये अश आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायु से स्पर्श, त्वचा, रूक्षता,
प्रेरण, धातु रचना और शारीरिक चेष्टायें उत्पन्न होती हैं । अग्नि से रूप, चक्षु,
प्रकाश, पाचन और उष्णिमा ये अंश उत्पन्न होते हैं । जल से रस, रसना,
शीतलता, कोमलता, स्नेह और क्लेद ये अंश उत्पन्न होते है । पृथिवी से गन्ध,
नासिका, भारीपन, स्थिरता ओर कठिनता ये अंश उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
एवमयं लोकसमितः पुरुषः । यावन्तो हि लोके भावविशेषास्ता-
वन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे, तावन्तो लोके, इति बुधास्त्वेवं द्रष्टु-
मिच्छन्ति ॥ १४ ॥
पुरुष की लोकतुल्यता—इस प्रकार पाच महाभूतों के विकारो से बना होने
के कारण यह पुरुष लोक समित अर्थात् लोक के तुल्य है । लोक में जितने भी
आध्यात्मिक अथवा अहंकार आदि भौतिक पदार्थ विशेष हैं, उतने ही सब
पदार्थ इस पुरुष मे भी हैं और जितने भाव ( पदार्थ ) पुरुष में हैं, उतने ही
इस लोक में हैं । इस प्रकार से लोक और पुरुष की समानता ज्ञानी पुरुष
देखना चाहते है ॥ १४ ॥
एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते, अन्यत्र तेभ्यो
भावेभ्यो येऽस्य जातस्योत्तरकालं जायन्ते, तद्यथा—दन्ता व्यञ्जनानि
व्यक्तीभावः, तथायुक्तानि चापराणि, एषा प्रकृतिः, विकृति पुनरतोऽ-
न्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिच्च नित्या भावाः, सन्ति चानित्याः
केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुंल्लिङ्गं
नपुंसकलिङ्गं वा बिभ्रति । ततः स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधान-
संश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा—
क्लैव्यं भीरुत्वमवैशारद्यमनवस्थानमधोगुरुत्वमसहनन शैथिल्यं मार्दवं