चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६११
पिप्पलीमूल, बच, कुटकी, पाठा, इन्द्रजौ, चीता और सोंठ इनका क्वाथ करके
पीना चाहिये अथवा इनके चूर्ण का गरम पानी से पीना चाहिये ॥१०३-१०४॥
सास्ने सातिविषं व्योषं लवणक्षारहिङ्गुवत् ।
निःक्वाथ्य पाययेच्चूर्णं कृत्वा वा कोष्णवारिणा ॥१०५॥
( १८) आमयुक्त शूल मे—अतीस, सोठ, मरिच, पिप्पली, सैन्धा नमक,
यवक्षार और हींग इनका क्वाथ करके पीना चाहिये । अथवा इनके चूर्ण को
गरम पानी के साथ पीना चाहिये ॥१०५॥
पिप्पली नागरं पाठा सारिवा बृहतीद्वयम् ।
चित्रकं कौटजं बीजं लवणान्यथ पञ्च च ॥ १०६ ॥
तच्चूर्णं सयवक्षारं दध्युष्णाम्बुसुरादिभिः ।
पिबेदग्निविवृद्धयर्थं कोष्ठवातहरं नरः ॥ १०७ ॥
इति पिप्पल्याद्यं चूर्णम् ।
( १६ ) अग्नि को बढ़ाने के लिये और उदर की वायु को शान्त करने के
लिये पिप्पल्याद्य चूर्ण—पिप्पली, सोंठ, पाठा, सारिवा, कटेरी और बड़ी कटेरी,
चीता, इन्द्रजो, पाचो नमक (सैन्धव, सचल, साभर, बिड और उद्भिद )
और यवक्षार इन सबका चूर्ण बना कर दही या गरम पानी अथवा सुरा या
काजी आदि के साथ पीना चाहिये ॥१०६-१०७॥
मरिचं कुञ्चिकाम्बष्ठावृक्षाम्लाः कुडवाः पृथक् ।
पलानि दश चाम्लस्य वेतसस्य पलाशिकाः ॥ १०८ ॥
सौवर्चलं बिडं पाक्यं यवक्षारः ससैन्धवः ।
शटीपुष्करमूलानि हिङ्गु हिङ्गुशिराटिका ॥ १०६ ॥
तत्सर्वमेकतः सूक्ष्मं चूर्ण कृत्वा प्रयोजयेत् ।
हितं वाताभिभूतायां ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥ ११० ॥
इति मरिचाद्यं चूर्णम् ।
(२०) मरिचाद्य-चूर्ण—मरिच, कुञ्चिका (काला जीरा), अम्बष्ठ (पाठा),
वृक्षाम्ल (समगदाना ) पृथक्-पृथक् एक कुडव, अम्लवेतस दस पल, संचल,
बिड् नमक, पाक्य (सामुद्र) नमक, यवक्षार, सैन्धा नमक, शटी, पोहकरमूल,
हींग, हिंगुशिराटिका (डीकामारी) ये प्रत्येक आधा पल लेकर सबको बारीक
चूर्ण कर लेना चाहिये। यह चूर्ण वातजन्य ग्रहणी-रोग तथा अरुचि मे
लाभदायक है ॥ १०८-११० ॥