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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 525

अ० १३] चिकित्सितस्थानम् ५४१
चाहिये । इनके कारण से मल ओर दोष के शिथिल होने पर शेष दोष का निका-
लने के लिये कल्याणकारी क्षार क मूत्र के साथ देना चाहिये ॥१६६-१६७॥
पार्श्वशूलोपस्तम्भं हृद्ग्रहं चापि मारुतम् ॥ १६८ ॥
जनयेद्यस्य तैल स बिल्वक्षारेण ना पिवेत् ।
(१४) जिम उदर-रोगी ने वायु पार्श्वशूल, ऊरुस्तम्भ और हृदय-पीड़ा
को उत्पन्न करदे, उसको बिल्व क्षारोदक के साथ तैल पिलाना चाहिये ॥१६८॥
तथाऽग्निमन्थश्योनाकपलाशतिलनालजैः ॥ १६९ ॥
बलाकदल्यपामार्गक्षारैः प्रत्येकशः स्रुतैः ।
तैलं पक्त्वा भिषग् दद्यादुदराणां प्रशान्तये ॥ १७० ॥
निवर्तते चोदरिणां हृद्ग्रहश्चानिलोद्भवः ।
(१५) इसी प्रकार से अग्निमन्थ, स्योनाक, ढाक, तिल नाल इनसे तैयार
किये क्षार, खरैटी, केला, अपामार्ग इनके बनाये क्षारो को छ गुणे पानी मे
घोल कर इक्कीस बार नितार लेना चाहिये । इस क्षारोदक से तेल पकाना
चाहिये । अग्निमन्थ आदि साता के क्षारो से पृथक् पृथक् तैल सिद्ध करना
चाहिये । यह तल उदर रोगी को देना चाहिये । इसस वातजन्य१ हृदयग्रह
और पार्श्वशूल मिटते ह ॥ १६६-१७० ॥
कफे वातेन पित्तेन ताभ्या वाऽप्यावृतेऽनिले ॥ १७१ ॥
बलिनः स्वौषधयुतं तैलमैरण्डजं हितम् ।
(१६) वायु द्वारा कफ के या वायु द्वारा पित्त के अथवा पित्त-कफ दोनो
से वायु के आवृत होने पर बलवान् उदररोगी को अपनी औषध से सिद्ध एरण्ड
तैल देना चाहिये ॥ १७१ ॥
सुविरिक्तो नरो यस्तु पुनराधमतीह तम् ॥ १७२ ॥
सुस्निग्धरम्ललवणैर्निरूहैः समुपाचरेत् ।
सोपस्तम्भोऽपि वा वायुराध्मापयति यं नरम् ॥ १७३ ॥
तीक्ष्णैः सक्षारगोमूत्रैर्बस्तिभिस्तमुपाचरेत् ।
(१७) यदि रोगी का भली प्रकार विरेचन देन पर तथा वस्त्र से पेट
बाधने पर भी आध्मान-अफारा हा जाये तो स्निग्ध, अम्ल, लवण से सिद्ध निरूह
बस्तियो से चिकित्सा करनी चाहिये । यदि वस्त्र बाधने पर भी वायु आध्मान
करे तो क्षार गोमूत्र युक्त तीक्ष्ण बस्तियो द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥१७२-१७३॥
१ वातकृतेषु पार्श्वशूलोपस्तम्भहृद्ग्रहेषु बिल्वक्षाराम्भसा तैल पाययेत् । स्योनाका-
म्निमन्थतिलकुन्तलकदल्यपामार्गोन्यतमक्षारेण वा विपक्व तैलम् । अष्टागस०चि०१७