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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 49 of 616

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३४ चरकसंहिता [ अ० २
तुरन्त गर्भस्थिति के लक्षण—मुख से लार आना, योनि मे भारीपन, अगों
का टूटना, तन्द्रा और हर्ष अर्थात् रोमाञ्च का अधिक होना और हृदय प्रदेश
में पीड़ा, योनि मे तृप्ति, सतुष्टि, अर्थात् भोग की इच्छा न रहना, बीज (शुक्र)
का ग्रहण अर्थात् उसका बाहर न आना, ये गर्भ के तुरन्त स्थित हो जाने
के लक्षण हैं ॥ २३ ॥
सव्याङ्गचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा ।
सव्यानगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यपदुग्धा स्त्रियमेव सूते ॥२४॥
पुत्रं त्वतो लिङ्गविपर्ययेण, व्यामिश्रलिङ्गां प्रकृतिं तृतीयाम् ।
गर्भ में स्थित कन्या और बालक के लक्षण—स्त्री बाए अगो से कार्य करने
वाली, पुरुष का चाह रखने वाली, स्त्रियों के स्वप्न, स्वप्न में स्त्रीलिंग वाले
खान पान करने वाली, स्त्रियो के शील एव चेष्टा मे प्रेम रखने वाली हो, बाए
कोख में वृद्धि, गर्भ परिमण्डल अर्थात् गोल आकार का न हा, वाम स्तन मे
प्रथम दूध का दर्शन हो तो वह स्त्री निश्चय से कन्या को ही उत्पन्न करती है।
उपरोक्त कन्या क लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाली स्त्री पुत्र को उत्पन्न करती
है। जिस स्त्री में कन्या और पुत्र दोनो के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं तो
वह नपुसक सतान उत्पन्न करती है ॥ २४ ॥
गर्भोत्पत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तु ब्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते ॥ २५ ॥
माता पिता के सदृश सन्तान का कारण—गर्भ की उत्पत्ति अर्थात् बीज
ग्रहण करने के समय स्त्री का मन जिस प्राणि या (वस्तु) का ध्यान करता है
वह स्त्री उसी के समान संतान उत्पन्न करती है* ॥ २५ ॥
गर्भस्य चत्वारि चतुर्विधानि भूतानि मातापितृसभवानि ।
आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्ति देहे ॥२६॥
तेषां विशेषाद् बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि ।
तानि व्यवस्येत्सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत् ॥ २७ ॥
माता से उत्पन्न होने वाले रज रूप और पिता से उत्पन्न होने वाले शुक्र
रूप तथा आहार से और अपने कर्मों मे उत्पन्न 'कर्मज' ये चार २ प्रकार के
वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चारों के १६ प्रकार के कर्मों में जो २ बलवान्
होते हे, उन २ के समान ही गर्भ का शरीर बनता है। माता के किये कर्मों के
बलवान् होने पर सन्तान माता के समान और पिता से उत्पन्न कर्मों के
बलवान् होने पर पिता के समान बनती है। मन अपने पूर्व देह अभ्यास मे

  • इसीलिये पाण्डु-पीले, धृतराष्ट्र अन्धे थे। चूंकि एक व्यास के रूप का
    देखकर पीली पड़ गई थी, और दूसरी ने आंखें बन्द करली थीं।