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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० २ ] शारीरस्थानम् ३१
पुत्र दोनों को एक साथ क्योकर उत्पन्न करती है ? (६) किस कारण से बहुत
से लड़कों को एक साथ उत्पन्न करती है ? (७) कभी चिरकाल मे गर्भ को
क्यों प्रसव करती है ? (८) किस कारण से युगल संतति मे एक संतान
अधिक वृद्धि को प्राप्त होती है ॥ ११ ॥
रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण, तेन द्विबिधीकृतेन ।
बीजेन कन्यां च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन ॥१२॥
शुक्राधिकं द्वैधमुपैति बीज यस्याः रुतौ सा सहितौ प्रसूते ।
रक्ताधिक वा यदि भेदमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते ॥१३॥
भिनत्ति यावद् बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः ।
तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात्प्रसूते ॥ १४ ॥
माता आर्तव की अधिकता से कन्या को उत्पन्न करती है । शुक्र की
अधिकता से पुत्र को उत्पन्न करती है और जिस समय शुक्र और रक्त रूपी
बीज के दो भाग हो जावें, एक भाग में रक्त की अधिकता हो और दूसरे भाग
में शुक्र की अधिकता रहे तब कन्या और पुत्र दोनों एक साथ उत्पन्न होते हैं ।
जिस स्त्री के गर्भ में शुक्र की अधिकता वाला बीज ( शुक्रार्त्तव ) दो भागों मे
विभक्त हो जाता है, वह स्त्री दो पुत्रों को एक साथ उत्पन्न करती है और जब
रक्त की अधिकता वाला बीज दो भागों में विभक्त हो जाता है, तब स्त्री दो
कन्याओं को एक साथ उत्पन्न करती है । वायु बहुत प्रबल होकर बीज ( शुक्र
आर्तव ) के जितने अधिक खण्ड कर देती है, उतने ही सन्तानों को अपने कर्म
के कारण स्त्री उत्पन्न करती है । ॐ इस मे स्त्री का अपना कोई वश नहीं है ।
आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा ।
तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥१५॥
कर्मात्मकत्वाद्विषमाशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्धिमुपैति कुक्षौ ।
एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एव यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः ॥१६॥
रसवाहिनी नाडी के दोष के कारण जिस समय गर्भ का आहार रस नहीं
ॐ कुत्ता आद जन्तुआ म जिस प्रकार स चार पाच बच्चे एक साथ उत्पन्न
होते हैं। इनमें शुक्र-आर्त्तव के जितने विभाग बनते हैं, इन विभागो में
जिनमें शुक्र की अधिकता रहती है, उतने नर और जितनों में आर्त्तव की
अधिकता रहती है, उतने मादा उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य-स्त्रियों में
भी समझना चाहिये ।