चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४६४ चरकसंहिता [ अ० १०
कम्पते प्रदशेद्दन्तान्१ फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।
परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥
(१) वातिक-अपस्मार के लक्षण—वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का
रोगी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से
सास लेता है, कठोर तथा काले रग के रूपो को देखता है। [ इसमे बार बार
प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥
(२) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकला झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है,
रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत्
को आग से व्याप्त अर्थात् चारो ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥
(३) कफजन्य अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकली झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाञ्चित और भारी
होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सञ्ज्ञा ( चेतना )
प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥
(४) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनो दोषो के लक्षण मिले रहते हैं।
यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाध्य हाता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ
तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥
मल (अपस्मार के प्रारम्भिक दोष) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक
मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि
से ] बलवान् हो जाते है। तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥
तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।
तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥
१. ‘दशते दन्तान्’ इति वा पाठः।