चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context२८ चरकसंहिता [ अ० २
सब पदार्थों से पृथक् हो जाता है, तब इसके प्राण अपान आदि लक्षण नहीं
रहते, इसलिये वे उपलब्ध नही होते ॐ ॥ १५५ ॥
गतिर्ब्रह्मविदां ब्रह्म तच्चाक्षरमलक्षणम् ।
ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति ॥ १५६ ॥
ब्रह्म का जानने वालों की ब्रह्म ही गति है। वह ब्रह्म 'अक्षर' कभी नाश
न होने वाला और लक्षण से रहित है, ब्रह्मविद् ही ब्रह्म को जानता है, अज्ञ,
मूर्ख पुरुष इस ब्रह्म को नहीं जान सकता ॥ १५६ ॥
तत्र श्लोकः-प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः ।
कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना ॥ १५७ ॥
इस 'कतिधापुरुषीय' शारीर में तत्त्वदर्शी भगवान् आत्रेय ने पुरुष को
उपलक्ष्य करके तेईस उत्तम प्रश्नों का निर्णय कर दिया है ॥ १५७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कतिधापुरुषीय
शारीर नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्याम ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्व अध्याय में धातु-भेद से पुरुष का वर्णन किया है। अब गर्भ की
उत्पत्ति को बताने के लिये 'अतुल्य गोत्रीय' नाम शारीर का व्याख्यान करेंगे ।
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अतुल्यगोत्रस्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य ।
किं स्याच्चतुष्पादप्रभवं च षड्भ्यो यत्स्त्रीषु गर्भत्वमुपैति पुंसः ॥३॥
स्त्री के गोत्र से भिन्न गोत्रवाले पुरुष का स्त्री के रजोधर्म हो चुकने के
पश्चात् स्त्री के साथ एकान्त स्थान में सम्भोग करते हुए, स्त्री की योनि में त्याग
और किया वह क्या पदार्थ है जो चतुष्पाद अर्थात् चार पाद अर्थात् गुणोंवाला
छः तत्त्वो से उत्पन्न होता है ओर जो स्त्रियों के शरीरों मे गर्भ रूप हो जाता है। ३।
शुक्रं तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय ।
वाय्वग्निभूम्यद्गुणपादवत् तत्, षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य ॥४॥
उत्तर--गर्भ की उत्पत्ति के लिये पुरुष जिस पदार्थ का स्त्री योनि मे
ॐ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।