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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 41

२६ चरकसंहिता [अ० १
नैष्कर्म्यमनहङ्कारः संयोगे भयदर्शनम् ॥ १४५ ॥
मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम् ।
तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥
मोक्ष के उपाय—सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास,
नाना प्रकार के नियम, धर्म शास्त्रों का अभ्यास, आत्मा आदि का जानना,
निर्जन स्थान में रति, विषयों में अनासक्ति, मोक्ष में प्रयत्न करना, धैर्य, कार्यों
के फल की इच्छा ने न करना, किये हुए कर्मों का फल भोग करके क्षय करना
गृहस्थाश्रम से निकलना, सन्यास ग्रहण करना, अहङ्कार का परित्याग, शरीरादि
संयोग में अथवा मनुष्यों के सम्पर्क में आने मे भय मानना, मन और बुद्धिका
समाधान, वस्तुओं की तत्त्व रूप से परीक्षा करना, यह सब तत्त्वज्ञान योग के
उपस्थित होने से होता है ॥ १४३–१४६ ॥
स्मृतिः सत्सेवनाद्यैश्च धृत्यन्तैरुपलभ्यते ।
स्मृत्वा स्वभावं भावाना स्मरन् दुःखात्प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥
स्मृति—तत्त्वस्मृति सज्जन पुरुषों के संसर्ग से लेकर धैर्य तक कहें हुए
लक्षणो से उपलब्ध हो जाती है, तब पुरुष आत्मा आदि भावों के स्वरूप का
स्मरण करक तत्त्व को जानता हुआ दुःखों से छूट जाता है ॥ १४७ ॥
वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतिर्यैरुपजायते ।
निमित्तरूपग्रहणात्सा दृश्यात्सविपर्ययात् ॥ १४८ ॥
सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात्पुनः श्रुतात् ।
दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मरणात्स्मृतिरुच्यते ॥ १४६ ॥
स्मृति की उत्पत्ति के आठ कारण—जिन कारणो से यह स्मृति उत्पन्न
होती है उन २ कारणों का उपदेश करते हैं। जैसे-- (१) निमित्त-कारण
से इनका ग्रहण, जैसे धूम को देख कर अग्नि का रूप दर्शन से (२) वातिक
लक्षणो से वातिक रोग का स्मरण होता है। (३) सादृश्य से जैसे देवदत्त के
समान चित्र को देख कर देवदत्त का स्मरण होता है (४) सादृश्य-विपर्यय
अर्थात् असादृश्य से, अत्यन्त विरुद्ध वस्तु के दर्शन से दूसरे का स्मरण होता है
जैसे दुःख से पूर्व अनुभूत सुख का स्मरण होता है । (५) सत्त्व (मन) के
प्रणिधान अर्थात् मनोयोग करने से । (६) अभ्यास से । (७) तत्त्वज्ञान से ।
(८) फिर सुनने से भूली बात फिर स्मरण हो जाती है । पूर्व दृष्ट, पूर्व श्रुत
और पूर्व अनुभूत पदार्थों के स्मरण को 'स्मृत' कहते हैं ॥ १४८-१४६ ॥