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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 378

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६३
हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् ॥ १११ ॥
समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् ।
मन्देऽग्नौ वर्धते गुल्मो दीप्ते चाग्नौ प्रशाम्यति ॥ ११२ ॥
तस्मान्ना नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घनम् १ ।
सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते ॥ ११३ ॥
या क्रिया क्रियते सिद्धिं सा याति न विरूक्षिते ।
वातगुल्म में पथ्य—मुर्गा, मोर, तीतर, कौंच, वत्तक, ( बटेर ), शालि
चावल, मदिरा, घी ये सब वस्तुयें वातगुल्म में औषध है। वातगुल्म के रोगी
के लिये उष्ण द्रव और स्निग्ध भोजन हितकारी है। अथवा मण्डयुक्त वारुणी
का पीना या धनेने से ( षडङ्गपानीय विधि से ) पकाये जल का उपयोग
उत्तम है। अग्नि के मन्द होने पर गुल्म बढ़ता है, अग्नि के बढ़ जाने पर
गुल्म शान्त हो जाता है। इसलिये पुरुष को चाहिये कि न तो बहुत तृप्त होकर
( पेट भरकर ) भोजन करे और न लङ्घन ही करे। मात्रा में थोडा खावे ।
सब गुल्म में प्रथम स्नेहन और स्वेदन करने पर फिर जो भी क्रिया की जाती
है, वह अवश्य सफल होती है। रूक्ष ( वात-प्रकोप की ) अवस्था में की हुई
क्रिया फलवती नहीं होती ॥११०-११३॥
भिषगात्ययिकं बुद्ध्वा पित्तगुल्ममुपाचरेत् ॥ ११४ ॥
वैरेचनिकसिद्धेन पयसा सर्पिषाऽपि वा ।
वैद्य को चाहिये कि पित्तगुल्म को घातक समझकर शीघ्र उपचार करे।
इसके लिये विरेचक वस्तुओं से सिद्ध हुए दूध या घी का प्रयोग करे ॥११४-॥
रोहिणीकटुकानिम्बमधुकं त्रिफलात्वचः ॥ ११५ ॥
कार्षिका त्रायमाणा च पटोलत्रिवृतोः पले ।
द्विपलं च मसूराणां साध्यमष्टगुणेऽम्भसि ॥ ११६ ॥
शृताच्छेषं घृतसमं सर्पिषश्च चतुष्पलम् ।
पिबेत्सन्मूर्च्छितं तेन गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ॥ ११७ ॥
ज्वरस्तृष्णा च शूलं च भ्रमो मूर्च्छाऽरुचिस्तथा ।
इति रोहिण्याद्यं घृतम् ॥
(१) रोहिण्याद्य घृत—कुटकी, नीम की छाल, मुलहठी, हरड़, बहेड़ा,
आंवला की बकली, त्रायमाणा प्रत्येक १ कर्ष, पटोल और निशोथ एक-एक
पल, मसूर २ पल इनको घी से आठ गुणे जल में पकावे। अष्टमांश ( ४ पल )
१ 'तस्मादन्नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घितम्' इति च पाठः ।