चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context२० चरकसंहिता [ अ० १
बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम् ।
प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचर हि तत् ॥ १०६ ॥
बुद्धि से विषम ( सम के विपरीत, अयथार्थ ) जानना, विषम रूप मे
प्रवृत्ति करना, यह प्रज्ञापराध है । यह प्रज्ञापराध मानस दोष है ॥ १०६ ॥
निर्दिष्टा कालसंप्राप्तिर्व्याधीना हेतुसंग्रहे ।
चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीना यथा पुरा ॥ ११० ॥
रोगों के हेतु रूप से काल को (कियन्त शिरसीय अध्याय सूत्र० १७ में)
कह चुके है । वही पर पित्तादि का जय, प्रकोप एव प्रशमन भी काल के
कारण कह दिया है ॥११०॥
मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः ।
जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या ॥ १११ ॥
पूर्वमध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामाश्रयश्च ये ।
तेषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ ११२ ॥
कालज रोग—वर्षा के अन्त वा शरद् से प्रारम्भ होने वाली छः ऋतुए
मिथ्या, हीन और अति लक्षणों वाली होती हैं । मिथ्या लक्षण जैसे ग्रीष्म
ऋतु में शीत होना । हीनलिङ्ग जैसे—गरमी में गरमी का कम होना । अति-
लिङ्ग जैसे—ग्रीष्म में गरमी का अधिक होना इत्यादि । जो भुक्त, जीर्ण
और प्रजीर्ण काल में, जो पूर्वाह्न, मध्याह्न एव अपराह्न मे, और जो
रोग रात्रि के पूर्व प्रहर, मध्यम प्रहर और अपर प्रहर में होते है वे सब
रोग कालजन्य हैं । इन सब में काल कारण होता है । [ अन्न के खाने
पर, पूर्वाह्न में और प्रदोष में श्लेष्मा प्रकुपित होता है । अन्न की पच्यमान
अवस्था में, मध्याह्न में और रात्रि के मध्य प्रहर मे पित्त और अन्न के जीर्ण
होने पर, अपराह्न मे और तीसरे याम मे वायु कुपित होता है । इन समयों में
इन्ही दोषों के रोग होते हैं ] ॥ १११-११२ ॥
अन्येद्युष्को द्वयहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ ।
स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषा बलागमः ॥ ११३ ॥
एते चान्ये च ये केचित्कालजा विविधा गदाः ।
अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥
प्रतिदिन होने वाला, 'द्वयहग्राही' दिन में दो बार होने वाला, 'तृतीयक'
एक दिन छोड़ कर तीसरे दिन आने वाला, 'चतुर्थक' बीच में दो दिन छोड़
कर होने वाला ( ज्वर ) अपने अपने समय में होते हैं, यही इनके बल का