चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ४ ] चिकित्सास्थानम् ३३१
याप्यं त्वधोग, मागौ तु द्वावसाध्य प्रपद्यते ॥ १६ ॥
यदा तु सर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च ।
वर्तते तामसङ्ख्येया गतिं तस्याऽऽहुराान्तिकाम् ॥ १७ ॥
यच्चोभयाभ्या मार्गाभ्यामतिमात्र प्रवर्तते ।
तुल्य कुणपगन्धेन रक्त कृष्णमतीव च ॥ १८ ॥
ससृष्ट कफवाताभ्या कण्ठे सज्जति चापि यन् ।
यच्चायुपद्रवैः सर्वैर्यथोक्तैः समभिद्रुतम् ॥ १९ ॥
हारिद्रनीलहरितताम्रैर्वर्णैरुपद्रुतम् ।
क्षीणस्य कासमानस्य यच्च तच्च न सिध्यति ॥ २० ॥
यद् द्विदोषानुग यद्वा शान्त शान्त प्रकुप्यति ।
मार्गान्मार्गं चरेद्यद्वा याप्य पित्तमसृक् च तत् ॥ २१ ॥
एकमार्ग बलवतो नातिवेग नवोत्थितम् ।
रक्तपित्त सुखे काले साध्य स्यान्निरुपद्रवम् ॥ २२ ॥
रक्तपित्त की गति—निदानस्थान मे रक्तपित्त की ऊर्ध्वगति के सात द्वार
( दो कान, दो नाक, दो आखे आर एक मुख ) है । इन सात मार्गों से रक्त
बाहर आता है । अधोगति के दो मार्ग है गुदा और उपस्थ । स्त्रियो मे योनि-
मार्ग का अन्तर्भाव उपस्थ मे ही हो जाता है । इनमे से ऊ॰ गति वाला
रक्तपित्त साध्य है और अधोमार्ग से जाने वाला याप्य है, और जो रक्तपित्त
दोनो मार्गों से प्रवृत्त होता है वह असाध्य है । जिस समय रक्तपित्त शरीर के
नौ छिद्रो से तथा रोमकूपो से जाने लगता है, तब इसकी असख्य वा आन्तकी
गति कहाती है । उस समय इसकी गति के मार्ग गिने नहीं जा सकते और
रागी शीघ्र मर जाता है । जो रक्तपित्त दोनो मागो से बहुत मात्रा मे प्रवृत्त
हाता है, जिस रक्तपित्त मे मुर्दे की सी बास आती हे, जिसका रग बहुत काला
हाता है, जिसमे कफ और वायु का मिश्रण रहता है, जो रक्तपित्त गले से बाहर
नहीं आता, वही रुक जाता है, निदानस्थान मे वर्णित दुर्बलता आदि उपद्रवो
से युक्त, पीला, नीला, हरा, ताबे के समान रग का दीखता हो, क्षीण व्यक्ति
का तथा जिसको खासी उठती हो, उसका 'रक्तपित्त' असाध्य है । जिस रक्तपित्त
मे दो दोषो का मिश्रण रहता है, अथवा जो रुक रुक कर उत्पन्न होता है,
अथवा कभी ऊर्ध्व मार्ग से चले और कभी अधोमार्ग से प्रवृत्त होता हो, वह
रक्तपित्त याप्य होता है । बलवान् पुरुप मे एक मार्ग से प्रवृत्त होने वाला,
जो बहुत प्रबल रूप मे न हो, नया ही उत्पन्न हुआ हा, साथ मे किसी प्रकार का
उपद्रव न हो तो रक्तपित्त सुखकाल ( हेमन्त और शिशिर ऋतु ) मे साध्य है ।