चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 264 of 616
Read in context२५० चरकसंहिता [ अ० २
निष्प्रजस्तृणपूलीति ज्ञातव्या पुरुषाकृतिः ॥ १८ ॥
अप्रतिष्ठश्च नग्नश्च शून्यश्चैकेन्द्रियश्च ना।
मन्तव्यो निष्क्रियश्चैव यस्यापत्यं न विद्यते ॥ १६ ॥
अपत्यरहित पुरुष—जिस प्रकार अकेला वृक्ष छायारहित, एक शाखावाला,
फलरहित तथा अनिष्ट गन्धवाला होता है, उसी प्रकार से पुत्ररहित मनुष्य भी
अकेला है। जिस प्रकार चित्र मे बना दीपक हो जैसा सूखा हुआ तालाब हो,
जैसे बिना धातु के, धातु के समान चमकने वाला पदार्थ हो, जैसे चाँदी के
समान चमकने वाला सीप हो, इसी प्रकार पुत्ररहित मनुष्य है। उसे तिनकों
वा घास की पूली से बना पुरुष के आकार का पुतला ही समझना चाहिये ।
जिस पुरुष के सन्तान नहीं होती उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं होती । वह नंगा,
अकेला (निःसहाय), शून्य, एक ही इन्द्रियवाला और निष्क्रिय होता है ॥ १७-१६॥
बहुमूर्तिर्बहुमुखो बहुव्यूहो बहुक्रियः ।
बहुचक्षुर्बहुज्ञानो बह्वात्मा च बहुप्रज ॥ २० ॥
मङ्गल्योऽय प्रशस्तोऽयं धन्योऽय वीर्यवानयम् ।
बहुशाखोऽयमिति च स्तूयते ना बहुप्रजः ॥ २१ ॥
बहुत सन्तानवाला पुरुष—जिस पुरुष के बहुत सन्तान होती है, वह बहुत
सी मूर्तियोंवाला, बहुत से मुखोंवाला, बहुत से व्यूह (सघात) वाला, बहुत सी
क्रियाओंवाला, बहुत सी आँखोंवाला, बहुत ज्ञानवाला, बहुत से आत्माओंवाला
होता है ! बहुत सन्तानवाले पुरुष की लोग स्तुति करते हैं कि वह मंगलमय है,
धन्य है, वीर्यवान् है, बहुत शाखाओंवाला है ॥ २०-२१ ॥
प्रीतिर्बल सुख वृत्तिर्विस्तारो विपुल कुलम् ।
यशो लोकाः सुखोदर्कास्तुष्टिश्चापत्यसश्रिता ॥ २२ ॥
तस्मादपत्यमन्विच्छन् गुणांश्चापत्यसश्रितान् ।
वाजीकरणनित्यः स्यादिच्छन् कामसुखानि च ॥ २३ ॥
प्रीति, बल, सुख, वृत्ति, विस्तार, कुल का विस्तार, यश, सुख देनेवाले
लोक, सन्तोष ये सब गुण सुतों पर आश्रित हैं। इसलिये सन्तान की चाह रखने
वाला तथा सन्तान पर आश्रित गुणों की कामना करनेवाला पुरुष सदा बाजी-
करण का सेवन करे और काम्य सुखों की भी इच्छा करे ॥ २२-२३ ॥
उपभोगसुखान् सिद्धान् वीर्योपत्यविवधनान् ।
वाजीकरणसंयोगान् प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम् ॥ २४ ॥
इसके आगे उपभोग में सुख देने वाले, वीर्य और अपत्य को बढ़ाने वाले,
सिद्ध, वाजीकरण प्रयोगों का उपदेश करूंगा ॥ २४ ॥