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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 255

पा० ४] १६ चिकित्सितस्थानम् २४१
नीला कमल, काली द्राक्षा, वायविडंग, चीता, बच, शतावरी, पयस्या (क्षीर-
विदारी), पिप्पली, जोङ्गक (अगरू), ऋद्धि, नागबला, द्वारदा (सागोन,
हरिद्रा पाठान्तर में हल्दी), यव, त्रिफला, कण्टकारी, विदारी, लाल चन्दन,
गन्ने की जड़, सरकण्डे की जड़, श्रीपर्णी (गम्भारी), तिनिश (आबनूस,
रथद्रुम), इनका पृथक् पृथक् रस ३२ प्रस्थ, कल्कार्थ पलाश क्षार १ पल,
गाय का दूध १२८ प्रस्थ, तिल तैल १६ प्रस्थ, गोघृत १६ प्रस्थ इनका यथा-
विधि स्नेहपाक करके छान लेना चाहिये। इन छने स्नेह में आवलों के रस से
सौबार भावना दिये आवले का चूर्ण एक आढक मिला देना चाहिये। फिर
ताजा शहद दो आढक, शर्कराचूर्ण एक आढक, बसलोचन और पिप्पली प्रत्येक
६४ तोले, मिलाकर आलोड़ित कर देना चाहिये। फिर घी से भावित मिट्टी के
पात्र में पन्द्रह दिनों तक रख देना चाहिये। पीछे से स्वर्ण, ताम्र, प्रवाल
(मूंगा), लोह, स्फटिक (बिल्लौर), मोती, वैडूर्य (लहसुनिया), शंख और
चांदी इनकी भस्मों का एक का १६ वा भाग मिलाना चाहिये। इसके पश्चात्
अग्नि बल के अनुसार इसका प्रयोग करना चाहिये। (आमलकादि चूर्णयुक्त
घृत की अपेक्षा से एक का १६ वा भाग लेना चाहिये)। इसके सेवन करते
समय परिश्रम और मैथुन का त्याग करना चाहिये। मात्रा के जीर्ण होने पर
साठी के चावलों को दूध और घी के साथ खाना चाहिये १।
यह रसायन सब रोगों को नाश करता है, शुक्रवर्धक, आयुवर्द्धक श्रेष्ठ है।
सत्त्व, स्मृति, कायाग्नि, बुद्धि और इन्द्रियों के बल को बढ़ाता है। विष
तथा दरिद्रता को दूर करता है। सब वाणियों को उपस्थित कर देता है। कामना
सिद्धि, नूतन वय (तारुण्य), जनता में सत्कार, संसार में यश चाहने वाले को इस
ब्राह्म तथा उदार-वीर्य रसायन का विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये ॥ १३-२६ ॥
समर्थनामरोगाणा धीमता नियतात्मनाम् ।
कुटीप्रवेशः क्षमिणां परिच्छदवता हितः ॥ २७ ॥
अतोऽन्यथा तु ये तेषा सौर्यमारुतिको विधिः ।
ताभ्यां श्रेष्ठतरः पूर्वो विधिः स तु सुदुष्करः ॥ २८ ॥
रसायनविविभ्रंशाज्जायेरन् व्याधयो यदि ।
यथास्वमौषधं तेषां कार्यं मुक्त्वा रसायनम् ॥ २९ ॥
१ षोडशी का अर्थ गंगाधर सन के मत से सम्पूर्ण औषध का एक का
१६ वा भाग प्रत्येक भस्म लेना किया है। जयदेव ने षोडशी का अर्थ एक
पल किया है। इसमें प्रमाण—‘प्रकुञ्च षोडशी बिल्व पलकं वात्र कीर्त्यते’दिया है।