Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 249 of 616

Read in context
Page 249

पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५
मायुर्जरा-व्याधि-बहुलमसुखमसुखानुबन्धमल्पत्वादल्प-तपो-दम-नियम-
दानाध्ययन-संचयं मत्वा पुण्यतममायुःप्रकर्षकरं जरा-व्याधि-प्रशमन-
मूर्जस्करममृतं शिवं शरण्यमुदात्तं मत्तः श्रोतुमर्हथोपधारयितुं प्रकाश-
यितुं च प्रजानुग्रहार्थमार्षं ब्रह्मचर्यं प्रति मैत्रीं कारुण्यमात्मनश्चानु-
त्तमं पुण्यमुदारं ब्राह्ममक्षयं कर्मेति ॥ ४॥
इन महर्षियों को सहस्र-चक्षु, श्रेष्ठ, देवगुरु इन्द्र ने कहा-आपका स्वागत
हो । ब्रह्मज्ञानी ज्ञान और तप के धनी आप ब्रह्मर्षियों में मन की बेचैनी, प्रभाव,
कान्ति का न होना, स्वरविकार, विवर्णता, नागरिकनिवास से उत्पन्न रोग, इन
रोगों से सम्बद्ध अन्य रोग भी दिखाई पड़ते हैं। सब अधर्म, पाप और रोग
आदि बुराइयों का मूलकारण नगर निवास ही है। आप पुण्यकर्मा जनों ने
अपने शरीर की परवाह न करके भी अन्य प्रजाओं का बड़ा उपकार किया है
और आयुर्वेद के उपदेश के लिये यही उत्तम समय है। इस आयुर्वेद को
ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने दोनों अश्वियों को, दोनों अश्वियों ने ब्रह्म-
र्षियों को, अपने और प्रजाजनों के लाभ के लिये मुझे प्रदान किया था। प्रजा-
जनों की आयु छोटी है, वह भी बुढ़ापा, रोग, अनारोग्य आदि दुःखों से
भरी है। आयु के थोड़ा होने से इनका तप, दम, नियम, दान, अध्ययन
आदि का संचय भी थोड़ा होता है। यह जानकर तुम मुझसे पुण्यतम, आयु को
लम्बा करने वाले, बुढ़ापे और रोग को मिटाने वाले, ओज को बढ़ाने वाले,
अमृत के समान, कल्याणकारी शरण लेने योग्य, उदार आयुर्वेद को सुनो।
[ इन्द्र की सभा में सहस्रों ऋषि इन्द्र के सहस्र चक्षु थे । ]
सुनकर उसे हृदयगम करके प्रजा की भलाई के लिये आर्ष सत्त्व, ब्रह्म-
चर्य के लिये प्राणियों पर मैत्री और करुणाभाव तथा अपने निज श्रेष्ठ पुण्य,
उदार, ब्रह्म ( ज्ञान ) सम्बन्धी अक्षय कर्म को प्रकाशित करने के लिये इस
आयुर्वेद का श्रवण करो ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा विबुधपतिवचनमृषयः सर्व एवामरवरमृग्भिस्तुष्टुवुः
प्रहृष्टाश्च तद्वचनमभिननन्दुश्चेति ॥ ॥
देवराज इन्द्र के वचनों को सुन कर सब ऋषियों ने ऋचा से इन्द्र की
स्तुति की और पुलकित होकर इन्द्र के वचनों का अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥
अथेन्द्रस्तदायुर्वेदामृतमृषिभ्यः संक्राम्योवाचैतत्सर्वमनुष्ठेयम् ।
अयं च शिवः कालो रसायनानां, दिव्याश्चौषधयो हिमवतः प्रभवाः
प्राप्तवीर्याः, तद्यथा-ऐन्द्री ब्राह्मी पयस्या क्षीरपुष्पी श्रावणी महाश्रावणी