Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 240 of 616

Read in context
Page 240

२२६ चरकसंहिता [ अ० १
मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् ।
रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्प्याः ॥ ३०॥
आयुःप्रदान्यामयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि ।
मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी ॥ ३१ ॥
इति मेध्यरसायनानि ।
मेधाकर रसायन चार हैं। जैसे—( १ ) मण्डूकपर्णी का स्वरस प्रयोग
करना चाहिये । ( २ ) गाय के दूध के साथ मुलहठी का चूर्ण खाना चाहिये ।
( ३ ) गिलोय का रस प्रयोग करना चाहिये । ( ४ ) मूल और पुष्प के साथ
शंखाहुली का कल्क बरतना चाहिये । * ये चारों रसायन आयुवर्धक, रोग
नाशक बल, अग्नि, वर्ण ( कान्ति ) और स्वर को बढ़ाते हैं । ये रसायन
मेधावर्धक हैं । इन में भी शंखपुष्पी खास कर बुद्धि को बढ़ाती है ॥३०-३१॥
पञ्च षट् १ सप्त दश वा पिप्पलीर्मधुसर्पिषा ।
रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्ने भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च ।
पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः ॥ ३३ ॥
प्रयोज्या मधुसर्पिर्भ्यां २ रसायनगुणैषिणा ।
जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्का गलामयान् ॥ ३४ ॥
अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम् ।
वैस्वर्यं पीनस शोफं गुल्मं वातबलासकम् ॥ ३५ ॥
इति पिप्पलीरसायनम् ।
पिप्पली रसायन—रसायन गुण को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि पांच,
छः, सात या दस पिप्पली को ( चूर्ण, फाण्ट, कल्क ) मधु और घी के साथ
एक साल तक भक्षण करे । पिप्पली को पलाश के क्षारोदक से भावना देकर
गाय के घृत में भून लेवे । इनमें से तीन तीन पिप्पली को घी में

  • मण्डूकपर्णी की प्रयोगविधि—दोषों से रहित होकर उक्त प्रकार के
    आगार में रह कर मण्डूकपर्णी का स्वरस लेकर सहस्र सम्पात आहुति शेष कर
    बल से जल को आलोड़न करके उसका पान करे । इसका दूध अनुपान है ।
    इसके जीर्ण होने पर यवान्न को दूध के साथ खावे । तीन मास दूध ही
    अन्नपान है ।
    १. 'पञ्चाष्टौ' इति च पाठ. । २. 'मधुमिश्रा' इति च पाठः ।