चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context२२२ चरकसंहिता [ अ० १
को ग्रहण नहीं करे) । इनकी गुठली निकाल कर छाया में शुष्क करे। इनको
इक्कीस बार आंवलों का स्वरस पिलावे। इस चूर्ण की एक आढक मात्रा ले लेवे ।
'षड्विरेचन शताश्रितीय' अध्याय में वर्णित जीवनीय, बृहणीय, स्तन्यजनक,
वय स्थापक ओषधि समूह और चन्दन, अगरु, धव तिनिश (साधने), खैर, शीशम
और असन इन वृक्षों के सार (मध्य काष्ठ) को टुकड़े २ करके तथा हरड़, बहेड़ा,
पिप्पली, वचा, चव्य, चित्रक, वायविडंग इन सब मिलित द्रव्यों का एक आढक
लेकर दस गुणे जल मे पकावे और जब रस एक आढक रह जाये तब इसको छान-
कर पूर्व तयार किया आंवले का चूर्ण मिला दे। फिर उपले और बास की खप्पच
सरकण्डा, तेजबल की लकड़ियो से आग को तेज करके इस को पकाता जाये।
जब सब रस शुष्क हो जाये (चूर्ण जले नही) तब उतार ले। बिना जले हुए
अवलेह को उतार कर लोहे की थालियों में फैलाकर शुष्क करे। शुष्क हो
जाने पर काले मृग की खाल पर रक्खी शिला पर खूब बारीक पीसकर लोहे
की थाली में रख दे। इस चूर्ण में लोह भस्म आठवा भाग मिलाकर घी और
मधु के साथ अग्निबल को देख कर सेवन करे ॥ ३ ॥
तत्र श्लोकाः-एतद्रसायनं पूर्वं वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः ।
जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुरन्ये च तद्विधाः ॥ ४ ॥
प्रयुज्य प्रयता मुक्ताः श्रमव्याधिजराभयात् ।
यावदच्छस्तपेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः ॥ ५ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण ध्यानेन प्रशमेन च ।
रसायनविधानेन कालयुक्तेन चाऽऽयुषा ॥ ६ ॥
स्थिता महर्षयः पूर्वेम्,
प्रथम वसिष्ठ, कश्यप, अंगिरा, जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, तथा अन्य इसी
प्रकार के ऋषियों ने इसका प्रयोग किया था । इसके प्रयोग करने पर वे श्रम,
रोग और बुढ़ापे से मुक्त हो गये थे । इसके प्रभाव से उन्होंने यथेच्छ तप किया
था। पूर्व काल में महर्षि रसायन विधि के द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान, प्रशम
तथा अनियत काल तक आयु का उपभोग करते रहे हैं ॥ ४-६ ॥
न हि किंचिद्रसायनम् ।
ग्राम्याणामन्यकार्याणां सिद्ध्यत्यप्रयतात्मनाम् ॥ ७ ॥
इदं रसायनं चक्रे ब्रह्मा वर्षसहस्रिकम् ।
जराव्याधिप्रशमनं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ ८ ॥
इत्यामलकायसब्रह्मरसायनम् ।