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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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Page 232

२१८ चरकसंहिता [ अ० १
चारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः । तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं
वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १३ ॥ इति भल्लातकक्षीरम् ।
भल्लातक क्षीर—जिन पर किसी प्रकार की चोट न लगी हो, जिनमें किसी
प्रकार का रोग ( कृमि आदि ) न हो, जो रस और वीर्य से भरपूर हों, अच्छे
परिपुष्ट हों, तथा जा पके हुए जामुन के समान काले रंग के हों, ऐसे भिलावों
को ज्येष्ठ ओर आषाढ मास में एकत्रित करके जौ से भरे कोठे में या उड़द के
ढेर में रख देवे । चार मास के पीछे अगहन या पौष मास मे इनका सेवन
आरम्भ करे। [ जौ आदि में से निकाल कर तुरन्त इनका सेवन न करे, बल्कि
शीत काल मे शीत गुण युक्त शरीरावस्था मे ही इनका उपयोग करे ] । अर्थात्
खाने से पूर्व शरीर को शीतल, स्नग्ध तथा मधुर वस्तुओं से संस्कृत करे ।
इनको सेवन करने का प्रकार यह है कि पहिले दस भिलावो को कुचल कर
आठ गुण पानी मे पकावे । जब आठवा भाग रस रह जाये तब इसको छान
कर इसमे दूध मिला कर पीवे और पीने से पूर्व मुख मे घी का लेप लगा लेव
जिससे मुख के भीतर का सारी त्वचा चिकनी हो जाय । इस प्रकार से प्रति
दिन एक एक भिलावे को बढाते हुए तीस भिलावे तक बढावे । तीस से ऊपर
भिलावे की मात्रा नहीं बढावे और फिर उसी प्रकार से घटा कर दस तक ले
आवे । इस प्रकार से एक हजार भिलावों का प्रयोग करे। भिलावों के जीर्ण
होने पर घी और दूध के साथ शालि या साठी के चावल खावे । प्रयोग के
उपरान्त [ जितने दिन भिलावों को प्रयोग किया उसमे दुगुने दिनों तक ] दूध
का ही उपयोग करे अर्थात् दोनों समय दूध पीवे । इस प्रकार करने से एक सौ
बरस की बिना वृद्धावस्था के आयु होता है। शेष पूर्व की भाति गुण हैं ।
[ अष्टाग सग्रह के टीकाकार इन्दु ने निम्न प्रकार से खाने की विधि बताई है ।
प्रथम दिन १० भिलावें, दूसरे दिन ११, तीसरे दिन १२ इस प्रकार से बढ़ाते
हुए बीसवें दिन २६, इक्कीसवे दिन ३०, बाईस से लेकर २७ वे दिन तक तीस
तीस ही ले, आगे न बढ़ाये । २८ वे दिन २६, २९ वें दिन २८, तीसवें दिन
२७, इस प्रकार से घटा कर सैनालिसवें दिन १० पर ले आवे, ४८ वें दिन भी
दस ही देवे । इस प्रकार से एक हजार पूरे हो जायेगे । यह एक हज़ार संख्या
आवश्यकतानुसार कम भी हो सकती है। प्रकृति की अपेक्षा से कम में भी परि-
त्याग किया जा सकता है। अष्टागसग्रह के अनुसार जितने दिन भिलावे का
प्रयोग किया हो उससे तिगुने दिनों तक दूध चावल खाना चाहिये ] ॥ १३ ॥
भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं