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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 121 of 616

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Page 121

१०६ चरकसंहिता [ अ० ८
या श्वेत सरसों के दो दो दानों के साथ दही में मिलाकर पुष्य नक्षत्र में पान
करे १। (२) दूसरी विधि—जीवक, ऋषभक, अपामार्ग, सहचर इनके
कल्क को सब के साथ अथवा अलग अलग दूब के साथ इच्छानुसार सस्कृत
कर लेना चाहिये । फिर कुड्य कीट ( भित्तिमत्स्य )२, मत्स्यकोड्र ( मत्स्यक ),
इनको चुल्लू भर पानी में मिला कर पुष्य नक्षत्र में पीना चाहिये । ( ३ ) तीसरी
विधि—स्वर्ण, चांदी या लोहे से बहुत सूक्ष्म मनुष्य की आकृति बना कर आग
में लाल करके, दही दूब या चुल्लू भर पानी में बुझाना चाहिये । फिर पुष्य
नक्षत्र मे इसका सम्पूर्ण रूप में पा लेना चाहिये । ( ४ ) चतुर्थ विधि—पुष्य
नक्षत्र में ही पकते हुए शाली के आटे की गरमी को सूघ कर और उसी चून
को जल में मिला कर उसके रस को देहली पर शिर रख कर अपने दक्षिण
नासापुट में रुई के फाये द्वारा सिंचन करे ( जिससे कि मुख म आ जाये ) ।
यह पुसवन के अनेक प्रकार हैं । इनके अतिरिक्त और भा जिस २ पुसवन या
इष्ट कर्म का ब्राह्मण या वृद्ध विद्वान् उपदेश करे उनको भी करे ३ ( जसे—
लक्ष्मणा ओषधि के रस को दक्षिण नासा पुट में डालना आदि ) ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वं गर्भास्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या-
सहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा शिवा-बलाऽरिष्टा-वात्यपुष्पी-विष्वक्सेनका-
न्ता च । आसामोषधीनां शिरसा दक्षिणेन पाणिना धारण, एताभिश्चैव
सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नान, सदा
समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयो-
गस्तैस्तैरुपयोगविविभिः । इति गर्भास्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति १८
इसके आगे गर्भास्थापन विधियों का उपदेश करते हे--ऐन्द्री, ब्राह्मी, शत-
वीर्या, सहस्रवीर्या ( दूब के भेद ), अमोघा ( पाटला ), अव्यथा ( गिलोय )
शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कटुरोहिणी ), वात्यपुष्पा ( पीतवला ), विष्व-
क्सेनकान्ता ( प्रियंगु ), इन ओषधियों को शिरमें तथा दक्षिण हाथ में धारण
करना चाहिये । इन ओषधियो से सस्कृत दूध वा घी का पान करना चाहिये ।
इन ओषधियों के क्वाथ से प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । इन
१ धान्यमाष शब्देन—ब्रीहि माष ग्राह्यन्ति, स्वर्णमाष च व्यावर्त-
यन्ति । चक्रपाणि ।
२ कुड्यकीट—दिवार में मिट्टी से जो कीड़ा घर बनाता है,
३ गर्भाधान और पुसवन विधि के लिये सस्कारविधि तथा बृहदारण्यकोप-
निषद में पुत्रेष्टि-प्रकरण ( बृहद्० उप० अ० ६ । ब्रा० ४ ।)