चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextब्रह्मा आदि से प्रणीत कुमारतन्त्रों के आप्तोपदेश से, अमानुषीय बल, रूप
आदि आश्चर्यकारक बातों के देखने से, समुत्थान ( रोगोत्पत्ति ) के कारणों के
विशेष होने से, लक्षणों के विशेष तथा चिकित्सा में भेद होने से और दोष प्रकोप
से हुए रोगों के विपरीत वर्णवाले लक्षणो को देखने से ज्ञात होता है कि देव
आदि के प्रकोप से भी अनेक रोग गर्भ को होते हैं ॥ २४ ॥
कालाकालमृत्योस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः—यः
कश्चिन्म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्तीत्येके । तच्चा
सम्यक् , न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षण-
स्वभावात् ।
काल और अकाल मृत्यओं के होने न होने के विषय में हमारा यह निश्चित
सिद्धान्त है कि ‘जो कोई मरता है, वह काल में ही मरता है। कइयों का विचार
है कि काल में कोई छेद ( अवकाश ) नहीं है जो कि इस अवकाश को प्राप्त
करके मरे।' यह मत ठीक नहीं। काल में सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं है.
क्योंकि काल के अपने लक्षण मे सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं घटती ।
तथाऽऽहुरपरे—यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः। स
सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति ।
दूसरे विचारकों का कथन है कि जो जब मरता है वह उसका निश्चित काल
होता है यह कालमृत्यु है । यह सब प्राणियों के लिये ठीक है, क्योकि काल
सब प्राणियों में समान क्रियावाला है । काल से सभी मरते हैं काल को किसी में
राग या द्वेष नहीं है ।
एतदपि च अन्यथाऽर्थग्रहणं, न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः ।
काल पुनःरायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते तस्य
स नियतो मृत्युकाल इति, तस्य सर्वभावा यथास्वं नियतकाला भवि-
ष्यन्ति । तच्च नोपपद्यते—प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं
विपर्यये चेष्टम् । प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तितासु तास्व-
वस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य । तद्यथा—कालोऽयमस्य तु व्याधेराहा-
रस्र्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य चाकालो वेति । लोकेऽप्येतद्भवति
काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य
काले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति
काले मृत्युरकाले च । नैकान्तिकं । यदि ह्यकाले मृत्युर्नस्यान्नियत-काल-
प्रमाणमायुः सर्वं स्यात् । एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्प्रत्यक्षानु-