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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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Page 633

शाल, तिन्दुक, बहेड़ा, कायफल, कमल गट्टा, बिस, मृणाल, ताड़, खजूर,
धीकार इन या कषाय वर्ग में गिने हुए अन्य द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से
धो कर पानी के साथ पूर्ववत् पकाना चाहिये। सिद्ध होने पर मधु-तेल और लवण
मिलाकर विधिपूर्वक श्लेष्मा के रोगी को कवोष्ण बस्ति देनी चाहिये। शीतल
होने पर घी और शहद मिला कर पित्तविकार के रोगी को देना चाहिये। यह
कषाय स्कन्ध कह दिया ॥१४१॥
तत्र श्लोकाः—षड्वर्गाः परिसंख्याता य एते रसभेदतः ।
आस्थापनमभिप्रेत्य तान् विद्यात्सार्वयोगिकान् ॥ १४२ ॥
सर्वशो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता।
सर्वान् रोगान्नियच्छन्ति येभ्य आस्थापनं हितम् ॥ १४३ ॥
येषां येषां प्रशान्त्यर्थं ये ये ते परिकीर्तिताः ।
द्रव्यवर्गा विकाराणां तेषां ते परिकोपनाः ॥ १४४ ॥
इत्येते षडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्याताः ।
आस्थापन बस्ति के अभिप्राय से रसों के भेद से जो ये छः वर्ग कहे हैं,
इन छः स्कन्धों को आस्थापन बस्ति से अच्छे होने वाले सब रोगों में लागू होने
वाले समझने चाहिये। क्योंकि दोष, दूष्य, देश, काल, मात्रा आदि की अपेक्षा
करके औषध-उपयोग को जानने वाले वैद्य द्वारा जिन रोगों के लिये आस्थापन
विधि हितकारी है, उन रोगों में प्रयुक्त किये हुए यह छः वर्ग सब रोगों का शमन
करते हैं। जिन जिन विकारों की शान्ति के लिये जो जो द्रव्यवर्ग नहीं कहे
हैं, वे २ उन २ रोगों को कुपित करते हैं, शान्त नहीं करते। इस प्रकार से छः
आस्थापन-स्कन्धों को रसों के अनुसार विभाग करके कह दिया ॥१४२-१४४॥
तेभ्यो भिषग्बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद् द्रव्यमयौगिकं मन्येत
तत्तदपकर्षयेत्, यद्यच्चानुक्तमपि यौगिकं वा मन्येत तत्तद् विदध्यात्।
वर्गमपि वर्गेणोपसंसृजेदेकमेकेनानेकेन वा युक्तिं प्रमाणीकृत्य । प्रच-
रणमिव भिक्षुकस्य बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञा-
नायतनं भवति । तस्माद् बुद्धिमतामूह्यापोहवितर्काः । मन्दबुद्धेस्तु
यथोक्तानुगमनमेव श्रेयः । यथोक्तं हि मार्गमनुगच्छन् भिषक् संसाध-
यति वा कार्यमनतिमहत्त्वाद्वा निपातयत्यनतिह्रस्वत्वादुदाहरण-
स्येति ॥ १४५ ॥
बुद्धिमान् वैद्य इन वर्गों में गिने हुए जिस द्रव्य को अयौगिक समझे उसको
निकाल देवे और न कहे हुए जिस द्रव्य को यौगिक समझे उसको इनमें मिला
लेवे। युक्ति के अनुसार दोष-दूष्य की विवेचना करके एक वर्ग को एक, अथवा