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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 630 of 639

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Page 630

६१२ चरकसंहिता [ अ० ८
वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन नामक बस्ति दे। दूध के ठण्डा होने पर घी
या मधु मिला कर पित्त विकार के रोगी को विधिपूर्वक बस्ति दे। यह मधुर-
स्कन्ध हुआ ॥ १३६ ॥
आम्राम्रातक-लकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल बदर-दाडिम-
मातुलुङ्ग-गण्डीरामलक-नन्दीतक-शीतक-तिन्तिडीक-दन्तशठैरावतक-
कोषास्र-धन्वनानां फलानि, पत्राणि चाम्रातकाश्मन्तक-चाङ्गेरीणां चतु-
र्विधानां चाम्लिकानां द्वयोः कोल्योश्चाम-शुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्काम्लिक-
योर्ग्राम्यारण्ययोः, वासव-द्रव्याणि च सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक-
मदिरा-मधु-सीधु-शुक्त-दधि-दधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लादीनि च ।
अम्‍लद्रव्यस्कन्ध- आम, आमड़ा, बड़हल (डहु), करौंदा, इमली, अम्ल
वेतस, कुवल और बदर (बेर के भेद), अनार, बिजौर, गण्डीर (समष्ठिल,
काकाम्र) आंवला नन्दीतक (तून), जललोटक (कालमेघ), निम्बु, ऐरावतक
(नारंगी), तिन्तिडीक (अमली), कच्चा आम और धन्वन (धामन), दन्तशठ
(कैथ) के फल, आम्रातक, अश्मन्तक (कचनार का भेद) और चांगेरी (शाक)
इनके पत्ते, चारों प्रकार का इमली, शुष्क आम, दोनों प्रकार के बेर, चार प्रकार
की इमली, (ग्राम्य और जंगली शुष्क और आर्द्र भेद से चार प्रकार की) इनके
पत्ते, आसव द्रव्य, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मेदक, मदिरा, मधु, सीधु, शुक्त,
दही, मस्तु, उदश्वित्, धान्याम्ल आदि ।
एषामेवंविधानां चान्येषां चाम्ल-वर्गे-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां
छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवैः स्थिराण्य-
वसिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैल-वसा-मधु-मज्ज-लवण-फाणि-
तोपहितं सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादित्य-
म्लस्कन्धः ॥ १३७ ॥
अम्लस्कन्ध में गिने इन और इन के समान अन्य औषध द्रव्यों के टुकड़े
करके, छोटा छोटा चूर्ण बना कर सुरा-सौवीर आदि द्रवों से सिंचन करके डेग
में रख कर पूर्व की भांति सिद्ध करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें तेल, वसा,
मज्जा, नमक, राब मिलाकर थोड़ी गरम अवस्था में वातरोगी को विधिपूर्वक
आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । यह अम्लस्कन्ध है ॥१३७॥
सैन्धव-सौवर्चल-कालविङ्ग-पाक्यान्प-कूप्य-बालुकैल-मौलक-सामुद्र-
रोमकौद्भिदौषर-पाटेयक-पांशुजानीत्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवण-वर्ग-
परिसंख्यातानि, एतान्यम्लोपहितान्युष्णोदकोपहितानि वा स्नेहवन्ति
सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति लवणस्कन्धः ॥