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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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Page 620

की अवस्था का नाम 'वय' कहा जाता है। यह वय अवस्था भेद से तीन प्रकार
का है। ( १ ) बाल, ( २ ) मध्य और ( ३ ) जीर्ण, इनमें बाल वय तीस वर्ष
तक है। इसमें भी १६ वर्ष तक रस, रक आदि धातु अपरिपक्व रहते हैं, दाढ़ी-
मूंछ आदि लक्षण स्पष्ट नहीं होते, शरीर सुकुमार, क्लेश न सहने वाला, असम्पूर्ण
बल वाला होता है। इस अवस्था में कफ धातु अधिक होता है। प्रायः करके
मन अस्थिर, धातु लगातार बढ़ रहे होते हैं। मध्यम वय—तीस से ऊपर और
६० से नीचे तक की आयु है। बल, वीर्य, विक्रम, पौरुष, पराक्रम, अर्थ का
ग्रहण, शब्द आदि का धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान, तथा सब धातुओं के गुण,
समान अवस्था में पहुंचे होते हैं। इस समय बल स्थिर रहता है मन निश्चल
हो जाता है, धातुओं के गुण नष्ट नहीं होते, पित्त प्रधान रहता है। जीर्ण
वय—६० वर्ष से ऊपर और १०० वर्ष के बीच के समय को जीर्ण वय कहते
हैं। इस समय में धातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, पौरुष, पराक्रम, ग्रहण, धारण,
स्मरण, वचन, विज्ञान एवं धातुओं के गुण क्रमशः क्षीण होरहे होते हैं। शरीर
में वायु की प्रधानता रहती है। इसलिये इस अवस्था को जीर्ण-अवस्था
कहते हैं।
इस काल में सौ वर्ष से अधिक या कम जीने वाले पुरुष भी हैं। इन
पुरुषों में विकृति को छोड़ कर अन्य प्रकृति आदि बल विशेष से तथा इन्द्रिय
स्थान में और शरीर स्थान में कहे हुए लक्षणों से आयु का प्रमाण जान कर
आयु के तीन विभाग* करने चाहियें ॥१२२॥
एवं प्रकृत्यादीनां विकृतिवर्ज्यानां भावानां प्रवरमध्यावरविभागेन
बलविशेषं विभजेत्। विकृतिबलत्रैविध्येन तु दोषबलं त्रिविधमनु-
मीयते। ततो भेषजस्य तीक्ष्णमृदुमध्यविभागेन त्रित्वं विभज्य यथा-
दोषं भेषज्यमवचारयेदिति ॥ १२३ ॥
इस प्रकार से विकृति को छोड़ कर प्रकृति से आरम्भ करके वय के अन्त
तक कहे हुए गुणों से प्रवर, अवर और मध्य विभाग करके इसके अनुसार
रोग के बल का प्रवर, अवर और मध्य विभाग करना चाहिये। विकृति बल के
भी तीन विभाग करके उनसे दोषों के तीन प्रकार के बलों का अनुमान किया
☸ सुश्रुत ने आयु का विभाग दोषों के संचय काल की दृष्टि से किया है।
चरक में धातुओं की वृद्धि, साम्य और क्षय की दृष्टि से किया है, यह ध्यान
रखना चाहिये।