चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 618 of 639
Read in context६०० चरकसंहिता [ अ० ८
क्लेशसहाश्चिरजीविनश्च भवन्ति। रूक्षसात्म्याः पुनरेक-रस-सात्म्याश्च
ये, ते प्रायेणाल्पबलाश्चाक्लेशसहा अल्पायुषोऽल्पसाधनाश्च। व्यामिश्रसा-
त्म्यास्तु ये, ते मध्यबलाः सात्म्यनिमित्ततो भवन्ति ॥ ११८ ॥
सात्म्य से परीक्षा करनी चाहिये। जिसके निरन्तर अभ्यास से सुख मिलता
है, उसको 'सात्म्य' कहते हैं। इसमें जो पुरुष घी, तैल, दूध, मांस रस का सेवन
निरन्तर करते हैं तथा जिनको सब सात्म्य है, वे बलवान्, क्लेश सहने वाले और
दीर्घायु होते हैं। जिन पुरुषों को रूक्ष पदार्थ सात्म्य हैं और जो एक ही रस का
अभ्यास करते हैं, वे पुरुष प्रायः करके अल्प-बल, थोड़ा कष्ट उठाने वाले,
अल्पायु, अल्पक्रिया से गुजारा करने वाले होते हैं। प्रवर और अवर इस
मिश्रित सात्म्य वाले पुरुष मध्य सात्म्य के कारण मध्यम बल होते हैं। इसलिये
मध्य क्लेश सहन करने वाले, मध्यमायु होते हैं ॥ ११८ ॥
सत्त्वतश्चेति-सत्त्वमुच्यते मनः, तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयो-
गात्। तत् त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं मध्यमवरं चेति। अतश्च प्रवर-
मध्यावरसत्त्वाश्च भवन्ति पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्त्वाः स्वल्पाः, ते सारे-
षूपदिष्टाः स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडा-
स्वव्यथा दृश्यन्ते, सत्त्वगुणवैशेष्यात्। मध्यसत्त्वास्त्वपरानात्मन्युपनि-
धाय संस्तम्भयन्त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्त्वास्तु
नाऽऽत्मना, न च परैः सत्त्वबलं प्रति शक्यन्त उपस्तम्भयितुं, महाशरीरा
ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, संनिहित-भय-शोक-लोभ-
मोह-माना रौद्र-भैरव-द्विष्ट-बीभत्स-विकृत-संकथास्वपि च पशुरुषमां-
सशोणितानि चावेक्ष्य विषाद-वैवर्ण्य-मूर्च्छान्माद-भ्रम-प्रपतनानामन्यत-
ममाप्नुवन्त्यथवा मरणमिति ॥ ११९ ॥
सत्त्व से परीक्षा करनी चाहिये। सत्त्व का अर्थ मन है। यह मन आत्मा
के साथ मिलकर इस शरीर को (इन्द्रियों को) प्रेरित करता है। यह सत्त्व-
संज्ञा वाला मन बल के भेद से प्रवर मध्य और अवर यह तीन प्रकार का है।
इसलिये प्रवर सत्त्व (शुद्ध) मध्यम सत्त्व (राजस) और अवर सत्त्व (तामस)
प्रकृति के मनुष्य होते हैं। इनमें प्रवर सत्त्वों का वर्णन 'सत्त्वसार' ओज के
वर्णन में (स्मृतिमान् आदि से) कह दिया है। ये प्रवर सत्त्व वाले व्यक्ति
छोटे शरीर के होने पर भी शारीरिक एवं आगन्तुज, बड़े रोगों में भी(तीव्र दर्दों
में भी) व्यथारहित दीखते हैं, बड़ी पीड़ा को भी कुछ नहीं मानते। इसका
कारण सत्त्वगुण की अधिकता है। ये अपने आत्मा से ही अपने को सम्भाल