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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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Page 609

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६१
इसी प्रकार बलवान् रोगों में अथवा बलवान् रोग से आक्रान्त होने पर
स्वल्प बल वाली औषधि बिना परीक्षा के दी हुई, रोग को शमन करने में
समर्थ नहीं होती ॥६५॥
तस्मादातुरं परीक्षेत-प्रकृतितश्च विकृतितश्च सारतश्च संहननतश्च
प्रमाणतश्च सात्म्यतश्च सत्त्वतश्चाऽऽहारशक्तितश्च व्यायामशक्तितश्च
वयस्तश्चेति बलप्रमाणविशेषग्रहणहेतोः ॥ ६६ ॥
इसलिये रोगी की परीक्षा ( निम्न साधनों से ) करनी चाहिये । यथा-
प्रकृति से, विकृति से, सार से, संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से,
प्रमाण से, सात्म्य से, सत्त्व से, आहार शक्ति से, व्यायाम-शक्ति से, और
वय से रोगी के बल, प्रमाण विशेष को जानने के लिये इन गुणों से परीक्षा
करनी चाहिये ॥ ६६ ॥
तत्रामी प्रकृत्यादयो भावाः। तद्यथा—शुक्र-शोणित-प्रकृतिं काल-ग-
र्भाशय-प्रकृतिमातुराहारविहार-प्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भश-
रीरमपेक्षते । एता हि येन येन दोषेणाधिकतमेनैकेनानेकेन वा समनु-
बध्यन्ते तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृतिरु-
च्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता । तस्माद्वातलाः प्रकृत्या केचित्,
पित्तलाः केचित्, श्लेष्मलाः केचित्, संसृष्टाः केचित्, समधातवः
प्रकृत्या केचिद्भवन्ति ॥ ६७ ॥
इनमें प्रथम प्रकृति आदि का वर्णन करते हैं । गर्भ का शरीर जैसे शुक्रएवं
शोणित की प्रकृति की, काल ( समय ) की, गर्भाशय की प्रकृति की, माता के
आहार-विहार की, शुक्र, शोणित में मिले पंच महाभूत, शरीरात्मक भूतों की
अपेक्षा करता है। ये शुक्र शोणित आदि प्रकृतियां जिस जिस वातादि
दोष से एक अथवा एक से अधिक दो या तीन से सम्बन्ध होती हैं, उसी एक
या अधिक दोष से गर्भ भी सम्बन्धित हो जाता है । इससे मनुष्यों की गर्भ में
बनी प्रकृति को उसी दोष की प्रकृति कहते हैं । उस उस दोष के बलवान् होने
से वह वह प्रकृति होजाती है । इसीलिये कई श्लेष्मप्रकृति, कई पित्तप्रकृति और
कई वात-प्रकृति और कई मिश्रित-प्रकृति, कईः समधातु-प्रकृति के होते हैं। इनके
लक्षण कहते हैं ।
तेषां हि लक्षणानि व्याख्यास्यामः - श्लेष्मा हि स्निग्ध-श्लक्ष्ण-मृदु-
मधुर-सार-सान्द्र-मन्द-स्तिमित-गुरु-शीत-पिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात्
श्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः, मृदुत्वाद् दृष्टिसुख-सुकुमा-
रावदातगात्राः, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहत-