चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextवाले वैद्य को चाहिये कि कार्य करने से पूर्व सम्पूर्ण परीक्षा से परीक्षणीय वस्तु
की परीक्षा करके काम करना आरम्भ करे ॥८१॥
तत्र चेद्विद्वाङ् अभिषग्वा भिषजं कश्चिदेवं पृच्छेत्-वमन-विरेचना-
स्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानि प्रयोक्तुकामेन भिषजा कतिविधया
परीक्षया कतिविधमेव परीक्ष्यं, कश्चात्र परीक्ष्यविशेषः, कथं च परी-
क्षितव्यः, किंप्रयोजना च परीक्षा, क्व च वमनादीनां प्रवृत्तिः, क्व च
निवृत्तिः, प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे च किं नैष्ठिकं, कानि च वमना-
दीनां भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्तीति ॥ ८२ ॥
यदि कभी भिषग् अथवा साधारण मनुष्य, जो वैद्य नहीं, वैद्य से पूछे कि
वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन देने की इच्छा वाले वैद्य
की कितनी प्रकार की परीक्षायें, कितने प्रकार का परीक्ष्य और परीक्षा में विशे-
षता क्या है, उसकी किस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये, परीक्षा का क्या
प्रयोजन है ? वमन आदि का कहाँ प्रयोग करना और कहाँ नहीं करना चाहिये!
प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लक्षण मिलें तो क्या करना ? वमन आदि कार्यों में
कौन से औषध द्रव्य काम में आते हैं, इत्यादि प्रश्न करे तब निम्न प्रकार से
उत्तर देना चाहिये ॥ ८२ ॥
स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत्, ब्रूयादेनं - बहुविधा हि परी-
क्षा तथा परीक्ष्यविधिभेदः, कतमेन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया
परीक्षया केन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदाग्रं
भवान्पृच्छत्याख्यायमानं, नेदानीं भवताऽन्येन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण
भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्या-
भिलषितमर्थं श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदप्रकृत्यन्तरेणान्येन वा
विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यं भित्त्वाऽन्यथाऽऽचक्षाण इच्छां प्रपूर-
येयमिति ॥ ८३ ॥
यदि वैद्य पूछने वाले को परेशान करना चाहे तो-परीक्षा और परीक्षा-
विधि इनके अनेक भेद होते हैं । आप कौन सी विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न
परीक्षा से अथवा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य के भेद को पूछना
चाहते हैं। वही कहा जाय ? आप से बिना यह जाने कि आप कौन से विधि-
भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा वा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य को
जानना चाहते हैं, मैं और भेदों को कहकर आपकी इच्छा को पूर्ण नहीं
कर सकता ॥८३॥