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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 585 of 639

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Page 585

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७
वाक्य को कहते हुए उससे बोलने के लिये कहना चाहिये कि 'नहीं कहते
अथवा तेरी प्रतिज्ञा हीन है।' और यदि वह फिर वाद-विवाद के लिये बुलावे
तो उसको कहना चाहिये कि—"एक साल और अधिक गुरु के पास पढ़, तेरे
लिये इतना ही पर्याप्त है।" एक बार पराजित हुए प्रतिवादी को पराजित ही
कहते हैं। अतः फिर इसके पक्ष का ग्रहण नहीं करना चाहिये । एक बार प्रति-
पक्षी को पराजित करके पुनः उसे अवसर नहीं देना चाहिये । कुछ आचार्यों
का मत है कि इस प्रकार अपने से श्रेष्ठ से भी प्रतिलोम जल्प कर लेना चाहिये
परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य अपने से श्रेष्ठ के साथ प्रतिलोम (विगृह्य) संभाषण की
इच्छा नहीं करते ॥ २० ॥
प्रत्यवरेण तु सह समानाभिभतेन वा विगृह्य जल्पतः सुहृत्परिषदि
कथयितव्यं, अथवाऽप्युदासीनपर्षदि अवधान-श्रवण ज्ञान-विज्ञानापधा-
रण-वचन-शक्ति-संपन्नायां कथयता चावहितेन परस्य साद्गुण्यदोषबलम-
वेक्षितव्यं; संवेक्ष्य च यत्रेमं श्रेष्ठं मन्येत, नास्य तत्र जल्पं योजयेदना-
विष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र त्वेनमवरं मन्येत तत्रैवेनमाशु निगृह्णीयात् ।
अपने से हीन या अपने समान प्रतिवादी के साथ सुहृत्परिषद्, उदासीन
परिषद् या मूढ़ परिषद् में विगृह्य संभाषण करना चाहिये । अथवा उदासीन
परिषद् में अवधान, श्रवण, ज्ञान, विज्ञान, उच्चारण, वचन, प्रतिवचन शक्ति,
आदि गुणों तथा क्रोध आदि दोषों की अपने में और दूसरे में तुलना करके
सावधानी से संभाषण करना चाहिये और परीक्षा करके जिस बात में प्रतिवादी
को अपने से श्रेष्ठ समझे, उस विषय में अपनी अयोग्यता को प्रकट न करते
हुए जल्प का प्रयोग नहीं करना चाहिये और जिस विषय में प्रतिवादी को
अपने से हीन समझे, उसमें इसको शीघ्रता से पकड़ लेना चाहिये ।
तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्त्युपायाः; तद्यथा—श्रुत-
हीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत्, विज्ञानहीनं पुनः कष्टशब्देन वाक्येन,
वाक्यधारणाहीनमाविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः, प्रतिभाहीनं पुन-
र्वचनेनैकविधेनानेकार्थवाचिना, वचनशक्तिहीनमर्धोक्तस्य वाक्यस्याऽऽ-
क्षेपेण, अविशारदमपह्नपेण, कोपनमायासेनेन, भीरुं वित्रासनेन, अन-
वहितं नियमेन । इत्येवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेत् ॥ २१ ॥
प्रतिवादी को शीघ्र निग्रह करने के लिये निम्न उपाय हैं। जैसे—जिसने
शास्त्र न पढ़ा हो उसको बड़े लम्बे २ सूत्र सुना कर पराजित करे । विशेष
ज्ञान से हीन अतिदुर्बोध अर्थ वाले, क्लिष्ट शब्दों से बने वाक्यों का प्रयोग करे ।