चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextठीक २ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रु के भी धन्य, यशकारी, आयुष्य,
पौष्टिक और लौकिक वचन को सुनना चाहिये और तदनुसार करना चाहिये॥१२॥
अतः परमिदं ब्रूयात्—देवताग्नि-द्विजाति-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येषु ते
नित्यं सम्यग्वर्तितव्यम् । तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायमग्निः सर्वगन्धरस-
रत्नबीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः । अतोऽन्यथा वर्तमानस्या-
शिवायति ।
इसके आगे निम्न प्रकार से उपदेश देवे—'देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु,
वृद्ध, सिद्ध और आचार्य इनकी प्रतिदिन भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये ।
इन देवताओं की भली प्रकार से सेवा करने पर यह तेरे सामने उपस्थित अग्नि
सब प्रकार के गन्ध, रस, रत्न, बीज और पूर्वोक्त देवता आदि सब तेरे लिये
मङ्गलकारी होंगे ।'
एवं ब्रुवति चाऽऽचार्ये शिष्यस्तथेति ब्रूयात् । तद्यथोपदेशं च कुर्वन्न-
ध्याप्यो ज्ञेयः, अतोऽन्यथा त्वनध्याप्यः । अध्याप्यमध्यापयन् ह्याचार्यो
यथोक्तैरध्यापनफलैर्योगमाप्नोत्यन्यैश्चानुक्तैः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमा-
त्मानं च युनक्ति । इत्युक्तावध्ययनाध्यापनविधी यथावत् ॥ १३ ॥
इस प्रकार से आचार्य के कहने पर शिष्य भो 'तथास्तु' कह कर स्वीकार
करे । आचार्य उपदेशानुसार करने वाले शिष्य को पढ़ावे और न करने वाले
को नहीं पढ़ावे । पढ़ाने के योग्य शिष्य को पढ़ाने से ही आचार्य को अध्या-
पन-कार्य का योग्य फल उचित लाभ मिलता है और यहाँ न कहे हुए दूसरे,
अनेक श्रेयस्कर गुणों से शिष्य को और अपने को भी युक्त करता है । इस
प्रकार अध्ययन और अध्यापन विधि कह दी ॥ १३ ॥
अध्ययनाध्यापनविधिवत्संभाषाविधिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः—
भिषक् भिषजा सह संभाषेत, तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी
भवति, वैशारद्यमपि चाभिनिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाऽऽधत्ते, यशश्चा-
भिदीपयति, पूर्वश्रुते च संदेहवतः पुनः श्रवणात् संशयमपकर्षति, श्रुते
चासंदेहवतो भूयोऽध्यवसायमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कंचिदर्थं
श्रोत्रविषयमापादयति, यच्चाऽऽर्थः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणो-
पदिशति गुह्याभिमतमर्थजातं तत्परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेन विजि-
गीषुराइ संहर्षात्, तस्मात्तद्विद्यसंभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः ॥ १४ ॥
संभाषणविधि—अध्ययन-अध्यापन विधि के समान ही अब संभाषणविधि
का वर्णन करते हैं । वैद्य वैद्य के साथ संभाषण करे । क्योंकि उसी विद्या को