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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 521 of 639

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Page 521

अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-उद्धृतानि खलु भगवन् !
भेषज्यानि विहितानि च सम्यक् सम्यग्विचारचारितानि च । अपि तु
खलु जनपदोद्ध्वंसनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहार-देह-
बल-सात्म्य-सत्त्व-वयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले ! हे भगवन् !
ओषधियां ठीक प्रकार से इकट्ठी की गईं, ठीक प्रकार से बना ली जायेंगी
और भली प्रकार से विचार कर ही ओषधियां दी जायेंगी । परन्तु भिन्न भिन्न
प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व और आयुवाले अनेक मनुष्यों का,
देश भर को ध्वंस कर देने वाला एक ही प्रकार का रोग क्यों हो जाता है ॥५॥
तमुवाच भगवानात्रेयः-एवमसामान्यानामेभिरप्यग्निवेश ! प्रकृ-
त्यादिभिर्भावैर्मनुष्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात्समानका-
लाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनिर्वर्त्तमाना जनपदमूद्ध्वंसयन्ति । ते
तु खल्विमे भावाः सामान्यजनपदेषु भवन्ति । तद्यथा-वायुरुदकं
देशः काल इति ॥ ६ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अग्निवेश ! इन प्रकृति आदि की भिन्नता
होने पर भी जो अन्य कारण सब मनुष्यों में समान रूप से रहते हैं, उन में
विकार आने से एक ही समय में, एक ही लक्षणोंवाले रोग उत्पन्न होकर जन-
पद का नाश कर देते हैं । जनपदों में निम्न कारण समान रूप से होते हैं ।
जैसे-वायु, जल, देश और काल ॥ ६ ॥
तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात् । तद्यथा-यथर्तुविषममति-
स्तिमितमतिचलमतिपरुषमतिशीतमत्युष्णमतिरूक्षमत्यभिष्यन्दिनमति-
भैरवारावमतिप्रतिहतपरस्परगतिमतिकुण्डलिनमसात्म्य - गन्ध - बाष्प-
सिकता-पांशु-धूमोपहतमिति ॥ ७ ॥
इन में निम्न लक्षणोंवाले वायु को आरोग्यनाशक समझना चाहिये ।
जैसे-ऋतु के विपरीत, सर्वथा गतिरहित, बहुत वेग वाला, अति कर्कश, अति
शीत, अति उष्ण, अतिरूक्ष, दोष, धातु, मल, स्रोतों में अति क्लिन्नता उत्पन्न
करनेवाला, बहुत भीषण शब्द करनेवाला, परस्पर वायु से वायु का वेग
खण्डित होता हो, आवर्त्त ( भंवरों ) वाला, हानिकारक-दुर्गन्ध वाला, बाष्प,
सिकता ( रेत ), पांशु ( धूलि ) और धुंए से व्याप्त हो, तब वायु को अनारो-
ग्यकारक. ( रोगकारक ) समझना चाहिये ॥ ७ ॥