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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 496 of 639

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Page 496

४७८ चरकसंहिता [ अ० ८

को लेकर ज्वर एक ही रोग उत्पन्न होता है और रूक्ष आदि बहुत से कारणों
से ज्वर आदि अनेक रोग भी उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२८ ॥
लिङ्गं चैकमनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
बहून्येकस्य च व्याधेर्बहूनां स्युर्बहूनि च ॥ २९ ॥
विषमारम्भमूलानां लिङ्गमेकं ज्वरो मतः ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येकः संतापो लिङ्गमुच्यते ॥ ३० ॥
विषमारम्भमूलैश्च ज्वर एको निरुच्यते ।
लिङ्गैरैतैर्ज्वरश्वासहिक्काद्याः सन्ति चाऽऽमयाः ॥ ३१ ॥
लक्षण भेद—अनेक रोगों का एक लक्षण, एक रोग का एक ही लक्षण, एक
रोग के बहुत से लक्षण और अनेक रोगों के बहुत से लक्षण होते हैं । जैसे—उष्मा
की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोगों का ज्वर रूप एक लक्षण होता है । ज्वर
रोग का एक ही लक्षण सन्ताप है । विषमारम्भ मूलक अनेक लक्षणों से युक्त
अकेला ज्वर होता है । इसी प्रकार विषमारम्भ मूलक लक्षणों से ज्वर, श्वास,
हिचकी आदि अनेक रोग होते हैं ॥ २६-३१ ॥
एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
व्याधेरेकस्य चानेका बहूनां बह्व्य एव च ॥ ३२ ॥
शान्तिरामाशयोत्थानां व्याधीनां लङ्घनक्रिया ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येका शान्तिर्लङ्घनमुच्यते ॥ ३३ ॥
तथा लघ्वशनाद्याश्च ज्वरस्यैकस्य शान्तयः ।
एताश्चैव ज्वरश्वासहिक्कादीनां प्रशान्तयः ॥ ३४ ॥
चिकित्सा विधान—अनेक रोग एक ही चिकित्सा से शान्त होजाते हैं,
एक रोग की शान्ति एक ही प्रकार से, एक रोग की शान्ति अनेक प्रकार से
और अनेक रोगों की शान्ति अनेक प्रकार से भी होती है । जैसे आमाशय से
उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों की शान्ति उपवास क्रिया से, ज्वर अकेले की
शान्ति उपवास से हो जाती है । इसी प्रकार अकेले ज्वर को शान्त करने के
लिये लघु भोजन आदि अनेक उपाय हैं । लघु भोजन आदि अनेक उपाय ज्वर,
श्वास, हिचकी आदि अनेक रोगों को शान्त करते हैं ॥ ३२-३४ ॥
सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ।
साध्यते कृच्छ्रसाध्यस्तु यत्नेन महता चिरात् ॥ ३५ ॥
सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य—सुखसाध्य रोग, सुखपूर्वक चिकित्सा
पर थोड़े समय में अच्छा हो जाता है । कष्टसाध्य रोग बहुत प्रयत्न
देर में अच्छा होता है ॥ ३५ ॥