चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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साध्यांस्तु भिषजः प्राज्ञाः साधयन्ति समाहिताः।
तीक्ष्णैः संशोधनैश्रैव यथास्वं शमनैरपि ॥ १५ ॥
यदा दोषनिमित्तस्य भवत्यागन्तुरन्वयः ।
तदा साधारणं कर्म प्रबदन्ति भिषग्वराः ॥ १६ ॥
साध्य और असाध्य—अपस्मार चार प्रकार का है । वातजन्य, पित्तजन्य,
कफजन्य और सन्निपातजन्य । इन में सन्निपातजन्य असाध्य है । साध्य
अपस्मारों को बुद्धिमान् वैद्य तीक्ष्ण संशोधन एवं संशमन क्रिया से अच्छा
करते हैं और जिस समय दोषज और आगन्तुज दोनों अपस्मार मिले रहते हैं
उस समय उत्तम वैद्य दोनों प्रकार की मिश्रित चिकित्सा करते हैं ॥१४-१६॥
सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वौषधविशेषवित् ।
भिषक् सर्वामयान् हन्ति न च मोहं निगच्छति ॥ १७॥
इत्येतदखिलेनोक्तं निदानस्थानमुत्तमम् ।
रोगज्ञान का फल—सब रोगों को और सब ओषधियों को भली प्रकार से
जानने वाला वैद्य सब प्रकार के रोगों को शान्त कर सकता है और कभी भी
घबराता नहीं । इस प्रकार से उत्तम निदानस्थान को सम्पूर्ण रूप में कह
दिया है ॥ १७ ॥
निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलब्धये ॥ १८ ॥
तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ।
रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां शोषश्चाप्युपजायते ॥ १९ ॥
प्लीहाभिवृद्धया जठरं जठराच्छोथ एव च ।
अर्शोभ्यो जठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ॥ २० ॥
प्रतिश्यायात्तथो कासः कासात्संजायते क्षयः ।
क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ॥ २१ ॥
एक रोग के कारण दूसरा रोग—एक रोग दूसरे रोग का निदान
अर्थात् उत्पादक कारण भी होता है । जैसे—ज्वर-सन्ताप से रक्तपित्त रोग
उत्पन्न होता है । रक्तपित्त और ज्वर से शोष रोग उत्पन्न होता है । प्लीहा के
बढ़ने से उदर रोग, उदर रोग से शोथ रोग उत्पन्न होता है । अर्श रोग से
दुःखदायी उदर रोग तथा गुल्म रोग भी उत्पन्न हो जाता है । प्रतिश्याय
से कास और कास रोग से क्षय तथा क्षय रोग से दूसरे अन्य रोग या शोष ही
उत्पन्न हो जाता है ॥ १८-२१ ॥
ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ।
उभयार्थकरा दृष्टास्तथैवैकार्थकारिणः॥ २२ ॥