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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 486 of 639

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Page 486

५६८ चरकसंहिता [ अ० ७
है—ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है। प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि के दोष
से ही मनुष्य देवता ऋषि, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गुरु, वृद्ध,
सिद्ध, आचार्य एवं पूज्य पुरुषो का अपमान करता है। अथवा अन्य किसी
प्रकार का निन्दनीय कर्म करता है। अपनी आत्मा द्वारा किये हुए अशुभ
कर्म के द्वारा उसी पुरुष को मारने के लिये देव आदि उस को उन्मत्त
कर देते हैं ॥ १२ ॥
तत्र देवादिप्रकोपोपनिमित्तेनाऽऽगन्तुकोन्मादेन पुरस्कृतस्येमानि
पूर्वरूपाणि भवन्ति। तद्यथा—देव-गो-ब्राह्मण-तपस्विनां हिंसारुचित्वं
कोपनत्वं नृशंसाभिप्रायता अरतिरोजोवर्ण-च्छाया-बल-वपुषामुपतप्तिः,
स्वप्ने च देवादिभिरभिभर्त्सनं प्रवर्त्तनं चेत्यागन्तुनिमित्तस्योन्मादस्य
पूर्वरूपाणि भवन्ति। ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः ॥ १३ ॥
आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप—देवता आदि के प्रकोप के कारण आगन्तुज
उन्माद के पूर्वरूप निम्न प्रकार के होते हैं। जैसे—देव, गौ, ब्राह्मण, तपस्वी
पुरुषो की हिंसा करने में रुचि, क्रोधीपन, दूसरे का अपकार करने की इच्छा,
उदासीनता, ओज, बल, वर्ण, छाया और शरीर में ताप होना, बिगड़ना, स्वप्न
में देवता आदि का तिरस्कार करना, अथवा इन पर क्रोध करना आदि
आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप हैं। इस के पीछे उन्माद उत्पन्न हो
जाता है ॥ १३ ॥
तत्रायमुन्मादकरणां भूतानामुन्मादयिष्यतामारम्भविशेषः। त-
द्यथा—अवलोकयन्तो देवा जनयन्त्युन्मादं, गुरु-वृद्ध-सिद्धर्षयोऽभि-
षपन्तः, पितरो धर्षयन्तः, स्पृशन्तो गन्धर्वाः, समाविशन्तो यक्षाः,
राक्षसास्त्वामगन्धमाघ्रापयन्तः, पिशाचाः पुनरधिरुह्य वाहयन्तः ॥ १४ ॥
उन्माद का प्रारम्भ—उन्माद को उत्पन्न करने वाले भूतों की उन्माद
को प्रारम्भ करने में निम्नलिखित प्रकार से भिन्नता होती है। यथा—देव
आँखों से देख कर ही उन्माद उत्पन्न करते हैं, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और ऋषिजन
शाप देकर, पितर-लोग धमकाकर, गन्धर्वगण स्पर्श करके, यक्ष शरीर में
घुसकर, राक्षस आम (सड़े मांस आदि की) गन्ध को सुंघाकर और पिशाच
चढ़कर उन्माद रोग को उत्पन्न करते हैं ॥ १४ ॥
तस्येमानि रूपाणि भवन्ति। तद्यथा—अमर्त्य-बल-वीर्य-
पराक्रम-ग्रहण-धारण-स्मरण-ज्ञान-वचन-विज्ञानानि, अनियतश्चो-
न्मादकालः ॥ १५ ॥