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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 484 of 639

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Page 484

५६६ चरकसंहिता [ अ० ७
मुरजी, सनई, ताल १ आदि वाद्यों का बेसुरा अनुकरण करना, ऊंची और न
चढ़ने योग्य सवारी पर चढ़ना, जिन वस्तुओं से शरीर का अलंकार नहीं करना
चाहिये उन से अलंकार करना, न मिलने वाले खाद्य पदार्थों में इच्छा, क्षोभ,
तथा प्राप्त वस्तुओं में तिरस्कार, बहुत अधिक द्वेष, मत्सरता ( ईर्ष्या ), कृशता,
कठोरता, आंखों में लाली तथा आंखों का बाहर निकलना, वातवर्धक पदार्थों
से रोग का बढ़ना ये वातजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥ ६ ॥
अमर्ष-क्रोध-संरम्भाश्चास्थाने, शस्त्र-लोष्ट्र-काष्ठ-मुष्टिभिरभिहननं
स्वेषां परेषां वा, अभिद्रवणं, प्रच्छायशीतोदकामाभिलाषः, संतापोऽ-
तिवेलं, ताम्र-हरित-हारिद्र-संरब्धाक्षता, पित्तोपशयविपर्यासादनुपशयता
चेति पित्तोन्मादलिङ्गानि भवन्ति ॥ ७ ॥
( २ ) पित्तजन्य उन्माद के लक्षण—अनुचित स्थान और अवसर में अस-
हिष्णुता दिखाना, क्रोध करना या स्तम्भित रह जाना, शस्त्र, मिट्टी का ढेला,
लकड़ी या मुट्ठी से अपने को या दूसरों को मारना, इधर-उधर दौड़ना, छाया,
शीतलखान पान ( अन्न या पानी ) की इच्छा करना, बहुत समय तक ताप
का होना, आंखो का ताम्बे के समान लाल, हरा-पीला एवं खुले रहना और
पित्तवर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये पित्तजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥७॥
स्थानमेकदेशे, तूष्णींभावो, अल्पशश्चङ्क्रमणं, लालासिङ्घाण-
कप्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषो, रहस्कामता, बीभत्सत्वं, शौचद्वेषः, स्वप्न-
निद्रता, श्वयथुरानने, शुक्ल-स्तिमित मलोपदिग्धाक्षता, श्लेष्मोपशयवि-
पर्यासादनुपशयता चेति श्लेष्मोन्मादलिङ्गानि भवन्ति ॥ ८ ॥
(३) कफजन्य उन्माद के लक्षण—एकान्त स्थान में चुपचाप बैठना, थोड़ा
चलना फिरना, मुख से लार, नाक से मल का गिरना, भोजन में अनिच्छा,
एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, भयानक विकृत रूप, स्वच्छता से द्वेष, नींद
कम होना, मुख पर सूजन, आंख में सफेदी भारीपन और मल का होना, कफ
वर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये कफजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥८॥
त्रिदोषलिङ्गसन्निपाते तु सांनिपातिकं विद्यात्, तमसाध्यमित्याच-
क्षते कुशलाः ॥ ६ ॥
(४) सांनिपातिक उन्माद—तीनों दोषो के एक साथ मिलने से सन्निपात-
जन्य उन्माद रोग हो जाता है। इस को कुशल वैद्य असाध्य कहते हैं ॥ ६ ॥
साध्यानां तु त्रयाणां साधनानि भवन्ति । तद्यथा-
१. शम्या दक्षिण हाथ से और ताल वाम हाथ से बजाया