चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context५६२ चरकसंहिता [ अ० ६.
और स्वप्न में पानी से रहित स्थानों में पानी को देखना, शून्य स्थानों में ग्राम,
नगर, जनपदों की प्रतीति होना जंगों का जकना, शुष्क होना या टूटना
देखना, गिरगट, मोर, बन्दर, तोता, सांप, कौवा, उल्लू आदि के साथ स्पर्श
की प्रतीति, कुशा, ऊंट, गधा, सुअर आदि पर चढ़कर सवारी करना, केश,
अस्थि, भस्म, भूसा, अंगारे के ढेरों पर चढ़ना आदि देखना, ये शोष रोग के
पूर्वरूप हैं ॥ १४ ॥
अत ऊर्ध्वमेकादश रूपाणि तस्य भवन्ति, तद्यथा—शिरसः प्रति-
पूरणं कासः श्वासः स्वरभेदः श्लेष्मणश्छर्दनं शोणित-ष्ठीवनं पार्श्वसं-
रुजनमंसावमर्दो ज्वरोऽतीसारस्तथाऽरोचक इति ॥ १५ ॥ -
ग्यारह रूप—इस के बाद राजयक्ष्मा के ग्यारह लक्षण हो जाते हैं । यथा-
( १ ) शिर का कफ से भरना, ( २ ) कास, ( ३ ) श्वास, ( ४ ) स्वरभेद,
( ५ ) कफ का गिरना, ( ६ ) थूक में रक्त आना, ( ७ ) पाश्र्वों में दर्द, ( ८ )
कन्धों का नीचे दबना, ( ६ ) ज्वर, ( १० ) अतिसार और ( ११ ) अरोचक
( अरुचि ) ॥ १५ ॥
तत्रापरिक्षीण-मांस-शोणितो बलवानजातारिष्टः सर्वैरपि शोषलिङ्गै-
रुपद्रुतः साध्यो ज्ञेयः, बलवर्णोपचयोपचितो हि सहिष्णुत्वाद् व्या-
ध्यौषधबलस्य कामं सुबहुलिङ्गोऽप्यल्पलिङ्ग एव मन्तव्यः । दुर्बलं त्व-
विक्षीण-मांस-शोणितमल्पलिङ्गमप्यजातारिष्टमपि बहुलिङ्गमेव जाता-
रिष्टमेव विद्यात्, तदसङ्गत्वद् व्याध्यौषधबलस्य, तं परिवर्जयेत्,
क्षणेन हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तश्चारिष्टप्रादुर्भाव इति ॥१६॥
साध्य और असाध्य रूप—जिस रोगी के मांस और रक्त कम नहीं हुए,
और शक्ति बनी हुई है और अरिष्ट-लक्षण उत्पन्न नहीं हुए, ऐसे रोगी को यदि
सब उपद्रव भी घेर लें तो भी रोगी साध्य है, क्योंकि जिस रोगी के बल और
वर्ण सुरक्षित हैं, यह व्याधि और औषध के बल को सुगमता से सह सकता है ।
इसलिये इस प्रकार का रोगी बहुत लक्षणों से युक्त होने पर भी थोड़े लक्षणों
वाला ही गिनना चाहिये । जो रोगी मांस और रक्त के क्षीण होने से बहुत
दुर्बल हो गया हो, इस में लक्षण चाहे थोड़े ही हों और कोई अरिष्ट-लक्षण न
भी उत्पन्न हुआ हो तो भी ऐसे रोगी को बहुत लक्षणों वाला और अरिष्ट लक्षणों
से युक्त ही गिनना चाहिये, क्योंकि यह रोगी औषधि और रोग के
सहन नहीं कर सकता, इसलिये छोड़ देना चाहिये । इस रोगी में