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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

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अ० २ ] निदानस्थानम् ४२१
करके संस्कारयुक्त हो जाता है उस प्रकार और कोई अन्य स्नेह पदार्थों के
गुण ग्रहण नहीं करता। इसलिये सब स्नेहों में घी ही श्रेष्ठ है ॥१६-२१॥
गद्योक्तो यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते ।
तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ॥ २२ ॥
जो अर्थ गद्यरूप में कहा गया है, उसी को श्लोक रूप में कहते हैं।
इसमें पुनरुक्त दोष नहीं है। क्योंकि गद्य में कहे हुए विषय को ही पुनः और
अधिक स्पष्ट और दृढ़ करने के लिये पद्य में कहा जाता है ॥२२॥
तत्र श्लोकाः—त्रिविधं नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम् ।
गदलक्षणपर्यायान् न्यायाः पञ्चविधं ग्रहम् ॥ २३ ॥
ज्वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम् ।
पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च ॥ २४ ॥
व्याख्यातवान् १ ज्वरस्याग्रे निदाने विगतज्वरः ।
भगवानग्निवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
रोगों के तीन प्रकार के हेतु, पर्यायवाचक शब्द, पांच प्रकार के रोग,
इनके लक्षण, पर्यायवाचक शब्द, रोगों के पांच प्रकारों का संग्रह, ज्वर के
आठ भेद, इसके समीप एवं दूरवर्ती कारण, ज्वर के पूर्वरूप, रूप और
औषध का संक्षेप में वर्णन, ये सब विषय 'ज्वर-निदान' नामक अध्याय में
विनीत अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु ने उपदेश किये।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने ज्वरनिदानं
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातो रक्तपित्तनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रक्तपित्त निदान का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥
पित्तं यथा भूतं लोहितपित्तमिति संज्ञां लभते तथाऽनुव्याख्या-
स्यामः। यदा जन्तुर्यवकोद्दालक-कोरदूषक-प्रायाण्यन्नानि भुङ्क्ते भृशोष्ण-
१. 'व्याजहार' इति पाठः ।