चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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चणकाश्च मसूराश्च खण्डिकाः सहरेणवः ।
लघवः शीतमधुराः सकषाया विरूक्षणाः ॥ २८ ॥
पित्तश्लेष्मणि शस्यन्ते सूपेषुवालेपनेषु च ।
तेषां मसूरः संग्राही कलायो वातलः परः ॥ २९ ॥
स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तः कषायः कटुकस्तिलः ।
त्वच्यः केश्यश्च बल्यश्च वातघ्नः कफपित्तकृत् ॥ ३० ॥
गुर्व्योऽथ मधुराऽशीता बलघ्न्यो रूक्षणात्मिकाः ।
सस्नेहा बलिभिर्भोज्या विविधाः शिम्बिजातयः ॥ ३१ ॥
शिम्बी रूक्षा कषाया च कोष्ठवातप्रकोपिनी ।
न च वृष्या न चक्षुष्या विष्टभ्य च विपच्यते ॥ ३२ ॥
आढकी कफपित्तघ्नी वातला कफवातनुत् ।
अवलगुजः सैडगजो, निष्पावा वातपित्तलाः ॥ ३३ ॥
काकाण्डोलात्मगुप्तानां माषवत्फलमादिशेत् ।
द्वितीयोऽयं शमीधान्यवर्गः प्रोक्तो महर्षिणा ॥ ३४ ॥
शमीधान्य वर्ग—१. मूंग कषाय, मधुर रस, रूक्ष, शीत, विपाक में कटु,
लघु, स्वच्छ, श्लेष्म पित्तनाशक और दालों में सब से उत्तम और शमीधान्यों
में भी उत्तम है। २. उड़द-अत्यन्त वृष्य, वातनाशक, स्निग्ध; उष्ण, मधुर
और गुरु हैं; ये बलकारक, अधिकमात्रा में मल उत्पन्न करने वाले,और पुरुषत्व
को शीघ्र उत्पन्न करने वाले हैं१। राजमाष मल-भेदक, रुचिकर, कफ, वीर्य
और अम्लपित्त को करने वाले, उड़द के समान मधुर, वायुकारक, रूक्ष, कषाय,
स्वच्छ और गुरु हैं। कुलत्थी कषाय रस, विपाक में अम्ल, कफ शुक्र और
वायुनाशक, ग्राही (संग्राही) तथा कास, श्वास, हिचकी, अर्श रोग में हितकारी
है। मोठ मधुर रस, मधुर विपाक, संग्राही, रूक्ष, शीतल, रक्तपित्त तथा ज्वर
में प्रशस्त हैं। चने, मसूर, खण्डिक त्रिपुट (फाफरा) और मटर लघु,
शीतवीर्य, मधुर, कषाय रस, रूक्ष, कफ-पित्त में हितकारी हैं। इन का उपयोग
दाल में तथा लेप में होता है। इन में मसूर सब से अधिक संग्राही और मटर
१. वृष्य वस्तु तीन प्रकार की होतो है । यथा—
शुक्रश्रुतिकरं किञ्चित् किञ्चिच्छुक्रविवर्धनम् ।
श्रुतिवृद्धिकरं किञ्चित् त्रिविधं वृष्यमुच्यते ॥
कोई वस्तु शुक्र का क्षरण करती, कोई शुक्र को बढ़ाती है और कोई दोनों
करती है। उड़द में तीनों प्रकार के गुण हैं ।